pankaj Farmer 588b3e4d8e719,588b33899ee56

kaddu ke kheti ke jankari deve

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20-Mar-2018 11:45
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प्रशांत सिंह तोमर बुरहानपुर Farmer 588b3e4d9128e,588b33899ee56
गेहूं का उत्पादन होता है और यह बाजार मूल्य क्या है किसानों को कितना फायदा होगा
09-Apr-2018 23:33
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देवेन चोहान Farmer 588b3e4d91e1c,588b33899ee56
खरगोन मंडी के भाव नही मिल रहा हे
06-Apr-2018 13:27
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Raghuveer Farmer 588b3e4daa9e1,588b33899fac7
mirchi ki kheti
06-Apr-2018 12:37
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Raghuveer Farmer 588b3e4daa9e1,588b33899fac7
kindly tell me how to grow chilli
06-Apr-2018 12:35
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gurjeet Farmer 588b3e4dafab1,588b33899fac7
narma ki kithi bare jankari deve -A to Z
05-Apr-2018 19:31
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satpal Farmer 588b3e4dac35f,588b33899fac7
sir june me palak ka konsa beej bove
05-Apr-2018 19:05
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अभिshek Farmer 588b3e4dc482a,588b3389a01bc
Sir mujhe athrakh ki kheti ke bare me jankari leni hai
05-Apr-2018 16:22
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manish Farmer 588b3e4dad1b2,588b33899fac7
aleo vera ke kheti ki jankari or sell karne ki liye market ya company ki jankari deve
05-Apr-2018 16:10
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विनोद Farmer 588b3e4d91e1c,588b33899ee56
सर अप्रैल माह में कौन सी फसल लगाऊ जो फायदेमंद हो
05-Apr-2018 10:26
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ganeah Farmer 588b3e4d91593,588b33899ee56
sir muje app me neemuch mandi ke bhav ki jankari chahiye or isme kuch hi mandiyo ki jankari he or comeditis b nahi bata rahi app
05-Apr-2018 09:52
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adarsh Farmer 588b3e4dc620e,588b3389a01bc
mentha me kay kare 30 day ka ho gay hay
04-Apr-2018 20:20
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adarsh Farmer 588b3e4dc620e,588b3389a01bc
nentha ke crop me kay kare
04-Apr-2018 20:17
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balmukund Farmer 588b3e4dab838,588b33899fac7
कद्दू की खेती आपके इंदौर जिले में बहुत अच्छे हो सकते हैं बस आपको इंदौर का मार्केट देखना है कि वहां पर साइज कैसे चलती है
04-Apr-2018 18:10
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Sudhir Farmer 588b3e4d74471,588b33899e44a
कोटन सीड रासी 773 और776 की बीजाई का समय
04-Apr-2018 12:53
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saurabh Farmer 588b3e4d97aea,588b33899efb3
मेरे चाट पर कमेंट करके। मुझे विदर्भ के लिए कपास के भाव के बारे में जानकारी दिजिये । कृपया मुझे कपास के भाव बढ़ेंगे या नहीं । जरा बताईये
04-Apr-2018 08:07
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Vishal Farmer 588b3e4dba2a5,588b3389a01bc
sir mirchi ki kheti k bare me jankari de please
03-Apr-2018 23:14
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अजय कुमार Farmer 588b3e4d68ff9,588b33899da5f
sir kya april may me tamatar ki kheti chhattisgarh ki baloda bazar area ki watawaran me kheti kiya ja sakta hai kya...kripya jankari deve ..
03-Apr-2018 21:09
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Anuj Farmer 588b3e4d73649,588b33899e44a
cucumber crop me npk dene ka sahi tarike bataye. Kis Kis stage pe npk de sakte hain kheere ki crop me
03-Apr-2018 02:52
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Ramgopal Farmer 588b3e4d8adda,588b33899ee56
sir ji me 1acar me mug(मूग) ki jevik kheti karna chahta hu abam jiski pedawar adhik ho apne khet ki mitti lal reteli hi puri jankari jankari dene ki krapa kare.......
02-Apr-2018 11:41
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gopal Farmer 588b3e4d7f24f,588b33899e890
nimbu ki kon si kism jada falan hoga..
02-Apr-2018 09:01
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jaber Farmer 588b3e4dc7d2b,588b3389a0323
tomato me konsi kitnaske pryoge krne ki jankari
02-Apr-2018 06:37
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प्रभात Farmer 588b3e4dba895,588b3389a01bc
गन्ने में मोथा बहुत उग रहा है कौनसी दवाई का स्प्रे करना चाहिए
02-Apr-2018 01:25
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raj Farmer 588b3e4daf7d4,588b33899fac7
hii
01-Apr-2018 22:32
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priyanshu Farmer 588b3e4dbd6f6,588b3389a01bc
सर हमें कोहडी के बारे मे पुरी जानकारी दीजीए
01-Apr-2018 21:22
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जनार्धन Farmer 588b3e4d8bfb1,588b33899ee56
मिर्च
01-Apr-2018 11:22
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vijay Farmer 588b3e4d73919,588b33899e44a
hamare pass mango tree bhout bada hai or uska bor gir jatta hai uske liye upaye bataye chana jaise lage hai
01-Apr-2018 08:48
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vijay Farmer 588b3e4d73919,588b33899e44a
kapas ke bare me puri jaankari de bone se todne tak
01-Apr-2018 08:42
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divyam Farmer 588b3e4dbc2be,588b3389a01bc
tractor per subsidy
01-Apr-2018 08:39
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इन्द्रजीत Farmer 588b3e4d61bd1,588b33899d781
छपरा सारण बिहार मे सरसो का बाजार भाव क्या है
31-Mar-2018 06:17
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AMIT Farmer 588b3e4d6415d,588b33899d781
kindly tell me about button mushroom and pappaya production
30-Mar-2018 19:51
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GIRIJA SHANKAR Professional 588b3e4d6efad,588b33899e2e9
Please send me characteristics of wheat variety 451 of Gujrat university phenotype and genotype also
29-Mar-2018 14:37
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GAURAV Professional 588b3e4db9e87,588b3389a01bc
gehu ki fasal kab boyi jati hai
29-Mar-2018 13:53
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prakash Farmer 588b3e4d8b409,588b33899ee56
tamatar Lagana Chahta Hoon Kitna kharcha aur kab ka fasal lagai Jana Chahiye
29-Mar-2018 13:17
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jaber Farmer 588b3e4dc7d2b,588b3389a0323
tomato ki fsle me yadi Pani ki kami ho to konsa chidkaw krna hoga jisse fsal buch jay
28-Mar-2018 23:02
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Saurabh Professional 588b3e4dc5c61,588b3389a01bc
केंचुआ ख़ाद/वर्मीकंपोस्ट -सभी किसान भाइयों से अनुरोध है कि वे वर्मीकंपोस्ट की अपनी थोक मांग के लिये संपर्क कर सकते हैं लागत खेतों तक वर्मीकंपोस्ट पहुंच के साथ में। कृपया इस पोस्ट के जवाब में अपना फोन नंबर, गांव का नाम और पिनकोड छोड़ दें। हमारे प्रतिनिधि आपको कॉल करेंगे। सीमित स्टॉक। अगला स्टॉक 15 April के बाद उपलब्ध होगा। बुकिंग के लिए कृपया 9891946642 पर संपर्क करें।
28-Mar-2018 19:09
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Amit Farmer 588b3e4dbe83e,588b3389a01bc
kaddu ak jyad ki crop hai Jo ferbari and March me boi jana bali phasal hai gisa tar moster and dry land ki me sowing ki gati hai
28-Mar-2018 17:57
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vinod Farmer 588b3e4d90fc5,588b33899ee56
phal ki saij badhane ke liye kon se posak tatv ki jarurat hoti he
28-Mar-2018 17:42
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vinod Farmer 588b3e4d90fc5,588b33899ee56
tarbuj ki nayi kism kon si he avm tarbuj ka mandi bhav Bhopal indor
28-Mar-2018 15:22
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vinod Farmer 588b3e4d90fc5,588b33899ee56
tarbuj mandhi bhav Bhopal indor ke chahiye
28-Mar-2018 15:17
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तिलकराम Farmer 588b3e4d8bfb1,588b33899ee56
Tamatar ki jhado me sadan ke upchar
28-Mar-2018 13:56
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SHIVAM PRATAP SINGH Farmer 588b3e4dbbfd5,588b3389a01bc
अभी गर्मी में कौन सी खेती हो सकती है
28-Mar-2018 09:34
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तन्नड Farmer 588b3e4d87089,588b33899eb7a
खेती के लिये पानी की व्यवस्था है ही नही।जमीन में पानी समाप्त हो चुका है। जहाॅ भी है वो कडवा है।सरकार कोई व्यवस्था करती नही।तो बताइये ऐसी स्थिति में किसकी फसल बोयें ।
27-Mar-2018 16:49
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pardeep Farmer 588b3e4d72de6,588b33899e44a
tometo me nimatod bimari hai sara podha julas gya hai koi dwai ho to btao
27-Mar-2018 15:10
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,
suraj kumar
27-Mar-2018 08:50
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विकास Farmer 588b3e4d68ff9,588b33899da5f
धान की कौन सी क़िस्म अच्छी रहती जिसका बीज लेना चाहिए
27-Mar-2018 08:28
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Sunil Professional 588b3e4d8d071,588b33899ee56
बालू जी नमस्कार। रोपण सामग्री प्राप्त करने हेतु संपर्क करें। निदेशक, आईसीएआर-सेंट्रल इंस्टिट्यूट फॉर सबट्रोपिकल हॉर्टिकल्चर रेहनखेरा, पी.ओ.ककोरी, 226101, लखनऊ, उतरप्रदेश फ़ोन: 0522-2841022, 23 0522-2841027, फैक्स: 91-0522-2841025, E mail: cish.lucknow@gmail.com
26-Mar-2018 22:55
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Sunil Professional 588b3e4d8d071,588b33899ee56
भेरू जी नमस्कार। पपीता की उन्नत खेती: पपीता, विश्व के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जाने वाला महत्वपूर्ण फल है।केला के पश्चात् प्रति ईकाई अधिकतम उत्पादन देने वाली एवं औषधीय गुणों से भरपूर फलदार पौधा है। जलवायु एवं भूमि: पपीता एक उष्णकटिबंधीय जलवायु वाली फसल है जिसको मध्यम उपोष्ण जलवायु जहॉ तापमान 10-26 डिग्री सेल्सियस तक रहता है तथा पाले की संभावना न हो, इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है।पपीता के बीजों के अंकुरण हेतु 30 डिग्री सेल्सियस तापमान सर्वोत्तम होता है।ठंड में रात्रि का तापमान 5 डिग्री सेल्सियस से कम होने पर पौधों की वृद्धि तथा फलोत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।पपीता की खेती के लिए 6.5-7.5 पी.एच मान वाली हल्की दोमट या दोमट मिट्टी जिसमें जल निकास अच्छा हो सर्वाधिक उपयुक्त होती है। उन्नत किस्में: पपीता की उन्नत किस्में: पूसा डेलिशियस, पूसा मैजेस्टी, सूर्या, रेड लेडी 786 आदि। रेड लेडी 786: पपीता की यह संकर किस्म है।  इसके पौधे    गायनोडिओसिस होते है। अर्थात पौधों में मादा एवं उभयलिंगी फूल आते है।जिसके कारण प्रत्येक पौधा फल देता है प्रति पौधा औसतन  30 से 40  फल  एक फसल मौसम में प्राप्त हो जाते है। फल औसतन 1.5  से 2 किलोग्राम वजन के होते है। गूदा अंदर से नारंगी-लाल एवं  मीठा होता है। फलों की भंडारण क्षमता अच्छी होती है। पपीते की पोध तैयारी करने की तकनीक तथा बीज की मात्रा: पपीते के 1 एकर  के लिए आवश्यक पौधों की संख्या तैयार करने के लिए परंपरागत किस्मों का 200 ग्राम बीज एवं संकर किस्मों का 30 ग्राम बीज की मात्रा की आवश्यकता होती है।पपीते की पौध क्यारियों एवं पालीथीन की थैलियों में तैयार की जा सकती है। क्यारियों में पौध तैयार करने हेतु क्यारी की लंबाई 3 मीटर, चैड़ाई 1 मीटर एवं ऊंचाई 20 सेमी रखें।प्लास्टिक की थैलियों में पौध तैयार करने के लिए 200 गेज मोटी 20 X 15 सेमी आकर की थैलिया (जिनमें चारों तरफ एवं नीचे छेद किए गए हो) में  रेत, गोबर खाद तथा मिट्टी के 1:1:1 अनुपात का मिश्रण भरकर प्रत्येक थैली में 1 बीज बोंए। खेत की तैयारी तथा रोपण तकनीक: पौध रोपण पूर्व खेत की तैयारी मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई कर 2-3 बार कल्टिवेटर या हैरो से जुताई करें।तथा समतल कर लें । पूर्ण रूप से तैयार खेत में 45 x 45 x 45 सेमी आकार के गढडे 2x2 मीटर (पंक्ति से पंक्ति एवं पौध से पौध ) की दूरी पर तैयार करें। पोषक तत्व प्रबंधन तकनीक: खाद एवं उर्वरको का उपयोग मृदा परीक्षण के बाद ही करें। सामान्तया तैयार किये गड्ढ़ों में गोबर की खाद 5 किलोग्राम ट्राइकोडर्मा 25 ग्राम, नीम खली 500 ग्राम, सिंगल सुपर फॉस्फेट 500 ग्राम, मयूरेट ऑफ पोटाश 250 ग्राम प्रति गड्ढा ऊपर की मिट्टी में मिलाकर गढ्डों को भर देवें। इसके बाद 200 ग्राम नत्रजन, 250 ग्राम फास्फोरस और 250 ग्राम पोटाश  प्रति पौधा प्रतिवर्ष 3-4 बराबर भागों में बांटकर दें। रोपण का समय: पपीते के पौधे पहले रोपणी में तैयार किये जाते है, पौधे पहले से तैयार किये गढ्ढे में जून, जुलाई में लगाना चाहिए, जंहा सिंचाई का समूचित प्रबंध हो वहाँ पर सितम्‍बर से अक्‍टूबर तथा फरवरी से मार्च तक पपीते के पौधे लगाये जा सकते है। सिंचाई एवं खरपतवार प्रबंधन तकनीक: पपीता के पौधो की अच्छी वृद्धि तथा अच्छी गुणवत्तायुक्त फलोत्पादन हेतु मिटटी में सही नमी स्तर बनाए रखना बहुत जरूरी होता है। नमी की अत्याधिक कमी का पौधों की वृद्धि फलों की उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।सामान्यतः शरद ऋतु में 10-15 दिन के अंतर से तथा ग्रीष्म ऋतु में 5-7 दिनों के अंतराल पर आवष्यकतानुसार सिंचाई करें।सिंचाई की आधुनिक विधि ड्रिप तकनीकी अपनाऐ। अंतःवर्तीय फसल: पपीते बाग में अंतःवर्तीय फसलों के रूप में दलहनी फसलों जैसे मटर, मैथी, चना, फ्रेंचबीन व सोयाबीन आदि ली जा सकती।मिर्च, टमाटर, बैंगन, भिण्डी आदि फसलों को पपीते पौधों के बीच अंतःवर्तीय फसलों के रूप में न उगायें। फलों की तुड़ाई: पौधे लगाने के 8 से 9 माह बाद फल तोडने लायक हो जाते है। फलों का रंग गहरा हरे रंग से बदलकर हल्‍का पीला होने लगता है तथा फलों पर नाखुन लगने से दूध की जगह पानी तथा तरल निकलता हो तो समझना चाहिए कि फल पक गया होगा। फलो को सावधानी से तोडना चाहिए। छोटी अवस्‍था में फलों की छटाई अवश्‍य करना चाहिए। फलो की तुड़ाई तथा श्रेणीकरण एवं पैकिंग: पपीता के पूर्ण रूप से परिपक्व फलोंको जबकि फल के शीर्ष भाग में पीलापन शुरू हो जाए तब डण्ढल सहित तुड़ाई करें। तुड़ाई के पश्चात् स्वस्थ, एक से आकार के फलों को अलग कर लें तथा सड़े गले फलों को अलग हटा दें। उपज: एक एकर  से 350 से 400 क्विंटल पपीते का उत्पादन  हो जाता है। रोग प्रबंधन: पपीते के पौधों में मुजैक, लीफ कर्ल, रिंगस्पॉट, जड़ एवं तना सडन ,एन्थ्रेक्नोज एवं कली तथा पुष्प वृंत का सड़ना आदि रोग लगते है। इनके नियंत्रण में वोर्डोपेस्ट का पेड़ो पर सडन गलन को खरोचकर लेप करना चाहिए अन्य रोग के लिए कापर ऑक्सि क्लोराइड 500 ग्राम या मेंकॉज़ेब 400 ग्राम प्रति एकर 200 लीटर  का पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। कीट प्रबंधन: पपीते के पौधों को कीटो से कम नुकसान पहुचता है फिर भी कुछ कीड़े लगते है जैसे माहू, रेड स्पाईडर माईट, निमेटोड आदि है ।नियंत्रण के लिए डाईमेथोएट 30 ई.सी. 400 मिली लीटर प्रति एकर या इमिडाक्लोप्रिड़ 17.8 एस एल.  40 मिली प्रति एकर 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने से रस चूसक कीटों  का नियंत्रण होता है। पपीता की रेड लेडी 786 किस्म के लिए संपर्क करें। राकेश पाटीदार, ग्राम-सावदा, विकास खण्ड- कसरावद, जिला-खरगोन, मध्यप्रदेश, मोबाइल नम्बर 919575807414
26-Mar-2018 22:41
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Balu Farmer 588b3e4dac092,588b33899fac7
aam k ache ped kha se mil skte h sir ji tell me
26-Mar-2018 21:25
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bheru Farmer 588b3e4daa6f9,588b33899fac7
मुझे पीपीता लगानी है वो कब ओर केसे लगानी चाहिए
26-Mar-2018 13:55
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Balwan Farmer 588b3e4d8c816,588b33899ee56
hy
26-Mar-2018 12:37
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Sunil Professional 588b3e4d8d071,588b33899ee56
नरेंद्र जी नमस्कार। पुदीना की उन्नत खेती: उपयोग : इसका प्रयोग नाक और श्वसन संबंधी उपचार की दवा में व्यापक रूप से किया जाता है। इसके अलावा इसका प्रयोग नसों का दर्द और गठिया के उपचार में पीड़ा नाशक के रूप में किया जाता है। टूथपेस्ट, दंत क्रीम, मिठाई, पेय पदार्थ, तम्बाकू, सिगरेट और पान मसाला जैसे अन्य वस्तुओं के निर्माण में उपयोग किया जाता है। उपयोगी भाग: पत्तियाँ जलवायु: पुदीने की खेती कई तरह के जलवायु में की जा सकती है। यह शीतोष्ण एवं समशीतोष्ण जलवायु में आसानी से लगाया जा सकता है। इसे सिंचित तथा असिंचित दोनों दशाओं में लगाया जा सकता है। परंतु सिंचित अवस्था में इसकी उपज असिंचित की अपेक्षा ज्यादा प्राप्त होती है। 20-25 डिग्री C तापमान में इसकी वानस्पतिक पैदावार अच्छी होती है। किन्तु भारतीय परिस्थितियों में 30 डिग्री C से अधिक तापमान पर तेल और मेन्थाँल की मात्रा अधिक मिलती है। मृदा: सिंचित फसल के रूप में पुदीना लगभग सभी प्रकार की मृदाओं में उगाया जा सकता है। बशर्तें उसमें जैविक खाद का उपयोग उपयुक्त मात्रा में किया गया हो उचित जल निकास वाली रेतीली दोमट मिट्टी पुदीना की खेती के लिये सर्वोंत्ताम मानी जातीहै। जिन खेतों में मिट्टी की पी.एच.6-7.5 तक हो वे खेत पुदीना की खेती के लिए उपयुक्त माने जाते है। मेंथा की प्रमुख स्पीसीज एवं उन्नत किस्में: मेंथा अरवेंसीस: CIM क्रांति, कौशल, कालका, कोसी, हिमालय, गोमती, CIM सूर्या, सक्षम, संभव, डमरू, MAS-1  आदि। मेंथा सित्राटा: किरण आदि। मेंथा पिपराटा: CIM इंडस, CIMAP- पात्र, CIM  मधुरस, प्रांजल, तुषार, कुकरैल आदि। मेंथा स्पिकाटा: नीरकालका, नीरा, अर्का, MSS-5  आदि। मेंथा स्पिकाटा किस्म विरिड्स: गंगा, सुप्रिया आदि। मेंथा ग्रसिलिस किस्म कार्डिआका: मुक्त, प्रतीक, MCAS-2  आदि। खाद एवं उर्वरक: प्रति हैक्टेयर पुदीने की खेती के लिए 100 क्विंटल प्रति एकर गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद तथा अच्छी फसल के लिए 50 कि.ग्रा. की दर से नाइट्रोजनी उर्वरक, 20 कि.ग्रा. की दर से P और K, 20 कि.ग्रा./ एकर की दर से एक अच्छी फसल के लिए आवश्यक होते है। पौध रोपण/ बुवाई: पुदीने की फसल के लिये अंत: भुस्तारी (सकर अथवा स्टोलॉन) का उपयोग किया जाता है। एक एकर क्षेत्र के लिये लगभग 150  किलोग्राम भुस्तारी की आवश्यकता होती है। पुदीने की रोपाई का उपयुक्त समय जनवरी- फरवरी माना जाता है।  परंतु मार्च-अप्रैल में भी इसकी रोपाई की जा सकती है। अगर रोपाई फरवरी के महीने में की जाये तो मात्र 2-3 सप्ताहों में इनकी जडें फूट आती है ओर आसानी से जल्दी ही पूरा पौधा फैल जाता हैं। भूस्तरी को छोटे टुकड़ो (7-10 से.मी.) में काटा जाता है और 45-60 से.मी. की कतार से कतार की दूरी पर 7-10 सें.मी. तक की गहराई में लगाया जाता है। रोपण के तुरंत बाद सिंचाई की जाती है। सिंचाई एवं जल निकास: शुष्क क्षेत्रों मेें उगाये जाने वाले पुदीना से समय-समय पर तथा उचित मात्रा में सिंचाई की जानी चाहिए क्योंकि पत्तिायों की उपज तथा तेल की गुणवत्ता के लिये सिंचाई का बहुत महत्व है। रोपाई के बाद हर 10-12 दिनों के अंतराल के बाद सिंचाई करनी चाहिए। बरसात के दिनों में इसके लिये खेतों में जल निकास की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए अन्यथा पौधा अधिक पानी की मात्रा के कारण नष्ट हो जाता है। खरपतवार नियंत्रण: पुदीने की फसल में खरपतवार के नियंत्रण के लिये कुल तीन बार निराई की जानी चाहिए। प्रथम निराई रोपण के करीब एक माह बाद द्वितीय करीब दो माह बाद तथा तृतीय कटाई के करीब 15 दिनाें बाद की जानी चाहिये। तुडाई/ कटाई एवं उपज: पुदीनें की प्रथम कटाई रोपण के करीब 100-120 दिनों बाद (जून के महीने में) की जाती है। दूसरी कटाई पहली कटाई के 80 दिनों बाद (अक्टूबर के महीने में) की जानी चाहिए। और तीसरी कटाई दूसरी कटाई के 80 दिनों के बाद की जाती है। अगर इसकी कटाई सही समय पर ना की जाये तो इसकी उपज तथा तेल की गुणवत्ताा पर विपरीत प्रभाव पडता है। उपज: एक हैक्टेयर से करीब 80 से 100 क्विंटल प्रति एकर  पुदीनें पत्तिायाें की उपज होती है, जिनसे प्रति वर्ष करीब 100 कि.ग्रा. तेल प्राप्त होता है। आसवन (Distillation) : पुदीना तेल या तो ताजी या सूखी पत्तियों को आसवित करके प्राप्त किया जाता है। आसवन दोनों विधियों पारंपरिक औप आधुनिक द्दारा किया जाता है। भाप आसवन विधि का प्रयोग किया जाता है। भडांरण (Storage) : पुदीना तेल हल्का, सुनहरा और तरल होता है और यह भंडारण से पहले नमी मुक्त होना चाहिए। इसे बडे इस्पात, जस्ता इस्पात या एल्युमीनियम कंटेनर में भंडारित किया जाता है। भंडारण स्थान ठंडे गोदाम होना चाहिए जो प्रकाश और आर्द्रता मुक्त हो। परिवहन : सामान्यत: किसान अपने उत्पाद को बैलगाड़ी या टैक्टर से बाजार तक पहुँचता हैं। दूरी अधिक होने पर उत्पाद को ट्रक या लाँरियो के द्वारा बाजार तक पहुँचाया जाता हैं। परिवहन के दौरान चढ़ाते एवं उतारते समय पैकिंग अच्छी होने से फसल खराब नहीं होती हैं। कीट एवं रोग प्रबंधन: रोयेदार सुण्डी तथा पत्ती रोलर कीट: रोकथाम के लिये. क्यूनालफॉस 400 मिली प्रति एकर 200 लीटर पानी की दर से छिडकाव करे। लालडी (कद्दू का लाल भृंग): रोकथाम के लिये मैलोथियॉन 50 ई.सी. 200 मिली प्रति एकर 200 लीटर पानी का छिडकाव करें। कटुआ कीट (कटवर्म) तथा दीमक: रोकथाम के लिये अंतिम जुताई के समय फॉरेट दाने दार 10 जी रसायन 4 किग्रा प्रति एकर की दरसे खेत की मिट्टी में मिलाये। भुस्तारी सडन तथा जड गलन: रोगों की रोकथाम के लिये रोपण के समय भुस्तारीओ को केप्टान  500 ग्राम प्रति एकर 200 लीटर पानी अथवा बेनलेट 200 ग्राम प्रति एकर 200 लीटर पानी के घोल से उपचारित करना चाहिए। रतुआ तथा पत्ताी धब्बा: रोगों की रोकथाम के लिये कॉपर ऑक्सिक्लोरराइड 600 ग्राम प्रति एकर 200 लीटर पानी अथवा मेंकॉज़ेब 75%डब्ल्यू. पी. 400 ग्राम प्रति एकर 200  लीटर पानी  का छिडकाव करें। चूर्णिल आसिता: रोग के प्रबंधन के लिये घुलनशील गंधक 600 ग्राम प्रति एकर 200 लीटर पानी या  कैराथन 200 मिली प्रति एकर 200 लीटर पानी का उपयोग करें।
26-Mar-2018 08:49
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रामवरण जी नमस्कार। मूँग की उन्नत खेती: मूंग ग्रीष्म एवं खरीफ दोनो मौसम की कम समय में पकने वाली एक मुख्य दलहनी फसल है। इसके दाने का प्रयोग मुख्य रूप से दाल के लिये किया जाता है जिसमें 24-26% प्रोटीन,55-60% कार्बोहाइड्रेट एवं 1.3%वसा होता है। दलहनी फसल होने के कारण इसकी जड़ो में गठाने पाई जाती है जो कि वायुमण्डलीय नत्रजन का मृदा में स्थिरीकरण (38-40 कि.ग्रा. नत्रजन प्रति हैक्टयर) एवं फसल की खेत से कटाई उपरांत जड़ो एवं पत्तियो के रूप में प्रति हैक्टयर 1.5टन जैविक पदार्थ भूमि में छोड़ा जाता है जिससे भूमि में जैविक कार्बन का अनुरक्षण होता है एवं मृदा की उर्वराशक्ति बढाती है। जलवायु: मूंग के लिए नम एंव गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है। इसकी खेती वर्षा ऋतु में की जा सकती है। इसकी वृद्धि एवं विकास के लिए 25-32 °C तापमान अनुकूल पाया गया हैं। मूंग के लिए 75-90 से.मी.वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र उपयुक्त पाये गये है। पकने के समय साफ मौसम तथा 60% आर्दता होना चाहिये। पकाव के समय अधिक वर्षा हानिप्रद होती है। भूमि: मूंग की खेती हेतु दोमट से बलुअर दोमट भूमियाँ जिनका पी. एच. 7.0 से 7.5 हो, इसके लिए उत्तम हैं। खेत में जल निकास उत्तम होना चाहिये। भूमि की तैयारी: खरीफ की फसल हेतु एक गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करना चाहिए एंव वर्षा प्रराम्भ होते ही 2-3 बार देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई कर खरपतवार रहित करने के उपरान्त खेत में पाटा चलाकर समतल करें।  ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती के लिये रबी फसलों के कटने के तुरन्त बाद खेत की तुरन्त जुताई कर 4-5 दिन छोड कर पलेवा करना चाहिए। पलेवा के बाद 2-3 जुताइयाँ बखर या कल्टीवेटर से कर पाटा लगाकर खेत को समतल एवं भुरभुरा बनावे। इससे उसमें नमी संरक्षित हो जाती है व बीजों से अच्छा अंकुरण मिलता हैं। बुआई का समय: खरीफ मूंग की बुआई का उपयुक्त समय जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई का प्रथम सप्ताह है एवं ग्रीष्मकालीन फसल को 15 मार्च तक बोनी कर देना चाहिये। बोनी में विलम्ब होने पर फूल आते समय तापक्रम वृद्धि के कारण फलियाँ कम बनती हैं अथवा बनती ही नहीं है इससे इसकी उपज प्रभावित होती है। उन्नत किस्मो का चयन: टॉम्बे जवाहर मूंग-3 (टी.जे. एम -3): यह किस्म खरीफ एवं जायद दिनों मौसम में लगाने के लिए उपयुक्त है। यह 60 से 70 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म की औसत उपज 4 से 5 क्विंटल प्रति एकर है। खाद एवं उर्वरक: मूँग में उर्वरको का उपयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करना चाहिए। सामान्यतया  मूँग में 50 किलोग्राम डीएपी,  15 किलोग्राम मयूरेट ऑफ पोटाश प्रति एकर  बुआई के समय 5-10 सेमी. गहरी कूड़ में आधार खाद के रूप में दें। बीज दर: खरीफ में कतार विधि से बुआई हेतु मूंग 8 कि.ग्रा./एकर पर्याप्त होता है। बसंत अथवा ग्रीष्मकालीन बुआई हेतु 10 किलोग्राम/एकर बीज की आवश्यकता पड़ती है। बुवाई से पूर्व बीज को कार्बेन्डाजिम   केप्टान (1 2) 3 ग्राम दवा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें। तत्पश्चात इस उपचारित बीज को विशेष राईजोबियम कल्चर की 5 ग्राम मात्रा प्रति किलो बीज की दर से परिशोधित कर बोनी करें। बुआई का तरीका: वर्षा के मौसम में इन फसलों  से अच्छा उत्पादन प्राप्त करने हेतु हल के पीछे पंक्तियों अथवा कतारों में बुआई करना उपयुक्त रहता है। खरीफ फसल के लिए कतार से कतार की दूरी 30-45 से.मी. तथा बसंत (ग्रीष्म) के लिये 20-22.5 से.मी. रखी जाती है। पौधे से पौधे की दूरी 10-15 से.मी. रखते हुये 4 से.मी. की गहराई पर बोना  चाहिये। सिचाई एवं जल निकास: प्रायः वर्षा ऋतु में मूंग की फसल को सिंचाई की आवश्यकता नहीं पडती है फिर भी इस मौसम में एक वर्षा के बाद दूसरी वर्षा होने के बीच लम्बा अन्तराल होने पर अथवा नमी की कमी होने पर फलियाँ बनते समय एक हल्की सिंचाई आवश्यक होती है। बसंत एवं ग्रीष्म ऋतु में 10-15 दिन के अन्तराल पर सिंचाई की आवश्यकता होती है। फसल पकने के 15 दिन पूर्व सिंचाई बंद कर देना चाहिये। वर्षा के मौसम में अधिक वर्षा होने पर अथवा खेत में पानी का भराव होने पर फालतू पानी को खेत से निकालते रहना चाहिये, जिससे मृदा में वायु संचार बना रहता है। खरपतवार नियंत्रण: मूंग की फसल में नींदा नियंत्रण सही समय पर नही करने सेफसल की उपज में 40-60 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है। फसल व खरपतवार की प्रतिस्पर्धा की क्रान्तिक अवस्था मूंग में प्रथम 30 से 35 दिनों तक रहती है। इसलिये प्रथम निदाई-गुडाई 15-20 दिनों पर तथा द्वितीय 35-40 दिन पर करना चाहियें। कतारों में बोई गई फसल में व्हील हो नामक यंत्र द्वारा यह कार्य आसानी से किया जा सकता है। चूंकि वर्षा के मौसम में लगातार वर्षा होने पर निदाई गुडाई हेतु समय नहीं मिल पाता साथ ही साथ श्रमिक अधिक लगने से फसल की लागत बढ जाती है। इन परिस्थितियों में नींदा नियंत्रण के लिये  नींदानाशक रसायन का छिड़काव करने से भी खरपतवार का प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है।खरपतवार नाशक दवाओ के छिडकाव के लिये हमेशा फ्लैट फेन नोजल का ही उपयोग करें। मूँग में चौड़ी एवं सकरी पत्ती के खरपतवारों की रोकथाम के लिए इमाईज़ेथापायर 10% एस. एल. 400 ग्राम प्रति एकर 200 लीटर पानी मे घोलकर बुआई के 20 दिन बाद भूमि में नमी होने पर छिडकाव करें। फसल पद्धति: मूंग कम अवधि में तैयार होने वाली दलहनी फसल हैं जिसे फसल चक्र में सम्मलित करना लाभदायक रहता है। मक्का-आलू-गेहूँ -मूंग(बसंत),ज्वार मूंग -गेहूँ , अरहर मूंग -गेहूँ , मक्का मूंग -गेहूँ , मूंग -गेहूँ । अरहर की दो कतारों के बीच मूंग की दो कतारे अन्तः फसल के रूप में बोना चाहिये। गन्ने के साथ भी इनकी अन्तरवर्तीय खेती सफलता पूर्वक की जा सकती है। कटाई एंव गहाई: मूंग की फसल 65-70 दिन में पक जाती है। अर्थात जुलाई में बोई गई फसल सितम्बर तथा अक्टूबर के प्रथम सप्ताह तक कट जाती है। फरवरी-मार्च में बोई गई फसल मई में तैयार हो जाती है। फलियाँ पक कर हल्के भूरे रंग की अथवा काली होने पर कटाई योग्य हो जाती है। पौधें में फलियाँ असमान रूप से पकती हैं यदि पौधे की सभी फलियों के पकने की प्रतीक्षा की जाये तो ज्यादा पकी हुई फलियाँ चटकने लगती है अतः फलियों की तुड़ाई  हरे रंग से काला रंग होते ही 2-3 बार में करें एंव बाद में फसल को पौधें के साथ काट लें। अपरिपक्वास्था में फलियों की कटाई करने से दानों की उपज एवं गुणवत्ता दोनो खराब हो जाते हैं। हॅंसिए से काटकर खेत में एक दिन सुखाने के उपरान्त खलियान में लाकर सुखाते है। सुखाने के उपरान्त डडें से पीट कर या बैंलो को चलाकर दाना अलग कर लेते है वर्तमान में मूंग एवं उड़द की थ्रेसिंग हेतु थ्रेसर का उपयोग कर गहाई कार्य किया जा सकता है। उपज एंव भड़ारण: मूंग की खेती उन्नत तरीके से करने पर 3-4 क्विंटल/एकर औसत उपज प्राप्त की जा सकती है। मिश्रित फसल में 1.5-2 क्विंटल/एकर उपज प्राप्त की जा सकती है। भण्ड़ारण करने से पूर्व दानों को अच्छी तरह धूप में सुखाने के उपरान्त ही जब उसमें नमी की मात्रा 8-10% रहे तभी वह भण्डारण के योग्य रहती है। मूंग का अधिक उत्पादन लेने के लिए आवश्यक बाते: स्वस्थ एवं प्रमाणित बीज का उपयोग करें। सही समय पर बुवाई करें, देर से बुवाई करने पर उपज कम हो जाती है। किस्मों का चयन क्षेत्रीय अनुकूलता के अनुसार करें। बीजोपचार अवश्य करें जिससे पौधों को बीज एवं मृदा जनित बीमारियों से प्रारंभिक अवस्था में प्रभावित होने से बचाया जा सके। मिट्टी परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरक उपयोग करे जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति बनी रहती है जो टिकाऊ उत्पादन के लिए जरूरी है। खरीफ मोसम में मेड नाली पध्दति से बुबाई करें। समय पर खरपतवारों नियंत्रण एवं पौध संरक्षण करें जिससे रोग एवं बीमारियो का समय पर नियंत्रण किया जा सके।
26-Mar-2018 08:48
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पुखराज जी नमस्कार। प्याज की उन्नत  खेती: प्‍याज की खेती  भारत के सभी भागों मे सफलता पूर्वक की जाती है। प्याज एक नकदी फसल है जिसमें विटामिन सी, फास्फोरस आदि पौष्टिक तत्व प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। इसका प्याज का उपयोग सलाद, सब्जी, अचार एवं मसाले के रूप में किया जाता है। गर्मी में लू लग जाने तथा गुर्दे की बीमारी में भी प्याज लाभदायक रहता है। भारत में रबी तथा खरीफ दोनो ऋतूओं मे प्‍याज उगाया जा सकता है। जलवायु: प्याज शीतोष्ण जलवायु की फसल है लेकिन इसे उपोष्णकटिबंधीय और उष्णकटिबंधीय जलवायु में भी लगाया जा सकता है। हल्के मौसम में इसकी अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है जब न अत्यधिक गरमी या ठंड हो और न ही अत्यधिक वर्षा। वैसे, प्याज के पौधे मजबूत होते हैं और युवा अवस्था में ठंडे तापमान का भी सामना कर सकते हैं। भारत में लघु दिवस प्याज मैदानों में लगाया जाता है, जिसे 10-12 घंटे लंबे दिन की आवश्यकता होती है। दीर्घ दिवस प्याज को 13-14 घंटे प्रकाश दिन की आवश्यकता होती है और यह पहाड़ियों में उगाया जाता है। वनस्पति विकास के लिए, कम प्रकाश समय के साथ कम तापमान की आवश्यकता होती है, जबकि उच्च तापमान के साथ लंबा प्रकाश समय प्याज के विकास और परिपक्वता के लिए आवश्यक है। वनस्पति चरण और प्याज के विकास के लिए अनुकूलतम तापमान क्रमशः 13-24 डिग्री सें.और 16-25 डिग्री सें. है। इसकी अच्छी वृध्दि के लिए 70सापेक्ष आर्द्रता की आवश्यकता होती है। जहाँ मानसून के दौरान अच्छे वितरण के साथ औसतन वार्षिक वर्षा 650-750 मि.मी. हो वहाँ प्याज की उपज अच्छी आती है। कम (<650 मीमी) या भारी (>750 मीमी) वर्षा के क्षेत्र इस फसल के लिए उपयुक्त नहीं है।   मृदा: प्याज सभी प्रकार की मिट्टी में उगाई जा सकती है जैसे कि रेतीली, दोमट, गाद दोमट और भारी मिट्टी। सफल प्याज की खेती के लिए सबसे अच्छी मिट्टी दोमट और जलोढ़ हैं जिसमें जल निकासी प्रवृत्ती के साथ अच्छी नमी धारण क्षमता और पर्याप्त कार्बनिक पदार्थ हों। भारी मिट्टी में उत्पादित प्याज खराब हो सकते हैं। वैसे भारी मिट्टी पर भी प्याज सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है, अगर खेती के लिए क्षेत्र की तैयारी बहुत अच्छी हो और रोपन से पहले जैविक खाद का प्रयोग किया जाए। प्याज की फसल के लिए मृदा सामू इष्टतम 6.0 - 7.5 होना चाहिए,लेकिन प्याज हल्के क्षारीय मिट्टी में भी उगाया जा सकताहै। प्याज की फसल अत्यधिक अम्लीय, क्षारीय और खारी मिट्टी और जल जमाव के लिए अधिक संवेदनशील है। प्याज 6.0 के नीचे सामू की मिट्टी में सूक्ष्म तत्व की कमी की वजह से  या कभी-कभी ॲल्युमिनीयम या मैगनीज विषाक्तता होने के कारण कामयाब नहीं है। उन्नत किस्में: खरीफ में बुवाई हेतु: एग्रीफाउंड डार्क रेड, भीमा सुपर, भीम डार्क रेड। रबी में बुआई हेतु: एग्रीफाउंड लाइट रेड, एग्रीफाउंड रोज, भीमा रेड, भीमा शक्ति,  पूसा रेड, पूसा रतनार। सफेद प्याज की किस्में: पूसा व्हाइट राउंड, पूसा व्हाइट फ्लैट, भीमा श्वेता, भीमा शुभ्रा। बीज की बुवाई: प्याज की बुवाई खरीफ मौसम में  मई के अन्तिम सप्ताह से लेकर जून के मध्य तक करते हैं। रबी फसल हेतु नर्सरी में बीज की बुवाई नवम्बर-दिसम्बर में करनी चाहिए। पौध तैयार करना: उचित पौधशाला प्रबंधन और रोपाई का प्याज की फसल में महत्वपूर्ण योगदान है। लगभग 0.05 हेक्टेयर क्षेत्र की पौधशाला 1 हेक्टेयर में रोपाई हेतु पर्याप्त है। इसके लिए खेत की 5-6 बार जुताई करना चाहिए जिससे ढ़ेले टूट जाए और मिट्टी भूरभूरी होकर अच्छी तरह से पानी धारण कर सके। भूमि की तैयारी से पहले पिछली फसल के बचे हुए भाग, खरपतवार और पत्थर हटा देने चाहिए। आखिरी जुताई के समय आधा टन अच्छी तरह से सड़ी हुइ गोबर की खाद 0.05 हेक्टेयर में मिट्टी के साथ अच्छी तरह से मिलाना चाहिए। पौधशाला के लिए 10-15 सें.मी. ऊंचाई, 1मी. चौड़ाई और सुविधा के अनुसार लंबाई की उठी हुई क्यारियां तैयार की जानी चाहिए। क्यारियों के बीच की दूरी कम से कम 30 सेमी होनी चाहिए, जिससे एक समान पानी का बहाव हो सके और अतिरिक्त पानी की निकासी भी संभव हो। उठी हुई क्यारियों की पौधशाला के लिए सिफारिश की गई है, क्योंकि समतल क्यारियों में ज्यादा पानी की वजह से बीज बह जाने का खतरा रहता है। लगभग 10 कि.ग्रा. बीज एक हेक्टेयर में पौध के लिए आवश्यक है। बुवाई से पहले बीज को  थाइरम 2 ग्राम /कि.ग्रा. बीज कार्वेनिन्डाजिम 1 ग्राम प्रति किलो ग्राम की दर से उपचार करें या ट्रायकोडरमा विरीडी 4 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजउपचार करें।  बीज 50 मि.मी. से 75 मि.मी. पर कतार में बोया जाना चाहिए जिससे बीज बुवाई के बाद रोपाई, निराई और कीटनाशकों का छिड़काव आसानी से हो सके। बुवाई के बाद बीज को सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट से ढका जाना चाहिए और फिर हल्के पानी का छिड़काव करना चाहिए। टपक या सुक्ष्म फव्वारा प्रणाली के माध्यम से सिंचाई करने पर पानी की बचत होती है। पौधशाला में मेटालेक्सिल 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के पर्णीय छिड़काव का मृदा जनित रोगों को नियंत्रित करने के लिए सिफारिश की गई है। कीड़ों का प्रकोप अधिक होने पर फिप्रोनील 1 मिली प्रति लीटर का पत्तों पर छिड़काव करना चाहिए। प्याज के पौध खरीफ में 35-40 दिनों में और पछेती खरीफ एवं रबी में 45-50 दिनों में रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं। खाद उर्वरक: प्याज की फसल से  भरपूर उत्पादन प्राप्त करने हेतु खाद एवं उर्वरको का उपयोग मृदा परीक्षण की अनुशंसा के अनुसार करें। सामान्तया अच्छी फसल लेने के लिये 100 क्विंटल प्रति एकर अच्छी सड़ी गोबर खाद प्रति हेक्टेयर की दर से खेत की अंतिम तैयारी के समय मिला दें। इसके अलावा 50 किलोग्राम DAP, 40 किलोग्राम यूरिया,  40 किलोग्राम मयूरेट ऑफ पोटाश, 10 किलोग्राम जिंक सलफेट, 20 किलोग्राम बेंटोनाइट सल्फर 90% प्रति एकर रोपाई के पूर्व देवें। प्याज में 25 किलोग्राम यूरिया प्रति एकर रोपाई के 30 दिन बाद तथा 25 किलोग्राम यूरिया रोपाई के 45 दिन बाद छिड़ककर दें। प्याज की अच्छी उपज हेतु  घुलनशील उर्वरकों का पर्णीय छिडकाव: यदि वानस्पतिक वृद्धी कम हो तो 19:19:19 पानी मे घुलनशील उर्वरक 1 किलोग्राम प्रति एकर 200 लीटर पानी मे घोलकर रोपाई के 15, 30 एवं 45 दिन बाद छिडकाव करें। इसके बाद 13:0:45 पानी मेे घुलनशील उर्वरक 1 किलोग्राम प्रति एकर 200 लीटर पानी मे घोलकर रोपाई के 60, 75 एवं 90 दिन बाद छिडकाव करें। अच्छी उपज व गुणवत्ता के लिए सूक्ष्म पोषक तत्वों का मिश्रण 200 ग्राम प्रति एकर 200 लीटर पानी मे घोलकर रोपाई के 45 और 60 दिन बाद छिडकाव करें। धन्यवाद। जैव उर्वरक: जैविक उर्वरकों में सूक्ष्मजीव उपस्थित होते हैं। जैविक उर्वरकों का उपयोग बीज उपचार या फिर मिट्टी में डालने के लिए किया जाता है। जब इन्हें बीज या मिट्टी में डालते हैं, तब इनमें उपस्थित सूक्ष्म जीव नत्रजन  स्थिरीकरण, फॉस्फोरस घुलनशीलता और दूसरे विकास वर्धक पदार्थों द्वारा प्राथमिक पोषक तत्वों की उपलब्धता में वृद्धि करते है जिससे पौंधौं का विकास होता है। प्या.ल.अनु.नि. में किए गए प्रयोगों के आधार पर, जैविक उर्वरक  ऐजोस्पाइरिलियम और फॉस्फोरस घोलनेवाले जीवाणु की 5 कि.ग्रा./हे. की दर से प्याज फसल के लिए सिफारिश की गई है। ऐजोस्पाइरिलियम जैविक नत्रजन स्थिरीकरण द्वारा मिट्टी में नत्रजन की उपलब्धता को बढ़ाते हैं और फास्फोरस घोलनेवाले जीवाणु के इस्तेमाल से मृदा में मौजूद अनुपलब्ध फॉस्फोरस पौधों के लिए उपलब्ध होते हैं जिससे फास्फोरस उर्वरकों की क्षमता बढ़ती है। पौध रोपण: रोपाई के लिए पौध का चयन करते समय ऊचित ध्यान रखना चाहिए। कम और अधिक आयु के पौध रोपाई के लिए नहीं लेने चाहिए। रोपाई के समय पौध के शीर्ष का एक तिहाई भाग काट देना चाहिए जिससे उनकी अच्छी स्थापना हो सके। प्याज की पौध स्थापना के दौरान फफूंदी संबंधी रोगों की घटनाओं को कम करने के लिए पौध की जड़ों कों कार्बेण्डाज़िम घोल (2 ग्राम प्रति लीटर पानी) में दो घंटें के लिए डूबाने के बाद रोपित किया जाना चाहिए। रोपाई के समय पंक्तियों के बीच 15 सें.मी. और पौधों के बीच 10 सें.मी. इष्टतम अंतर होना चाहिए। सिंचाई: मौसम, मिट्टी का प्रकार, सिंचाई की विधि और फसल की आयु पर प्याज में सिंचाई की आवश्यकता निर्भर करती है। आम तौर पर  रोपाई के समय, रोपाई से तीन दिनों बाद और मिट्टी की नमी के आधार पर 7-10 दिनों के अंतराल पर सिंचाई की जरूरत होती है। खरीफ फसल में 5-8 बार, पछेती  खरीफ फसल में 10-12 बार और रबी की फसल में 12-15 बार सिंचाई की जरूरत है।  प्याज एक उथले जड़ की फसल है जिसकी उचित वृद्धि और कन्द विकास हेतु इष्टतम मिट्टी की नमी बनाए रखने के लिए लगातार हल्के सिंचाई की जरूरत होती है। फसल परिपक्व होने के पश्चात (फसल कटाई से 10-15 दिन पहले) सिंचाई बंद करनी चाहिए। इससे भंडारण के दौरान सड़न को कम करने में मदद मिलती है। अतिरिक्त सिंचाई प्याज की फसल के लिए हानिकारक होती है तथा शुष्क समय के बाद सिंचाई करने से दुफाड कन्द बनते है। प्याज में टपक सिंचाई: आधुनिक सिंचाई तकनीक जैसे टपक सिंचाई और फव्वारा सिंचाई से पानी की बचत और प्याज की विपणन योग्य उपज में बढ़ौतरी होती है। टपक सिंचाई में, पौध को 15 सें.मी. ऊंची, 120 सें.मी. चौड़ी क्यारियों में 10 x 15 सें.मी. की दूरी पर लगाना चाहिए। हर चौड़ी उठी हुई क्यारी में 60 सें.मी. की दूरी पर दो टपक लेटरल नलियां (16 मि.मी. आकार) अंतर्निहित उत्सर्जकों के साथ होनी चाहिए। दो अंतर्निहित उत्सर्जकों के बीच की दूरी 30-50 सें.मी. और प्रवाह की दर 4 ली./घंटा होनी चाहिए। फव्वारा सिंचाई प्रणाली: फव्वारा सिंचाई प्रणाली में दो लेटरल (20 मि.मी.) के बीच की दूरी 6 मी. और निर्वहन दर 135 लि./घंटा होनी चाहिए। शोध परिणामों से पता चलता है कि बाढ़ सिंचाई की तुलना में टपक सिंचाई से ए श्रेणी के कन्द की अधिकता, 35-40% पानी की बचत और 20-30%श्रम की बचत के साथ कन्द उपज में 15-25% वृध्दि होती है।   फर्टीगेशन: उर्वरकों को टपक सिंचाई द्वारा इस्तेमाल करना एक प्रभावी और कारगर तरीका है। इसमें पानी को पोषक तत्वों के वाहक एवं वितरक के रुप में उपयोग किया जाता है। उच्च विपणन योग्य कन्द उपज और मुनाफा प्राप्त करने के लिए 40 कि.ग्रा. नत्रजन रोपाई के समय आधारीय मात्रा के रूप में और शेष नत्रजन का उपयोग छह भागों में, रोपाई से 60 दिनों बाद तक 10 दिनों के अंतराल पर टपक सिंचाई के माध्यम से किया जाना चाहिए। टपक सिंचाई प्रणाली न केवल पानी की बचत करने में मदद करता है बल्कि भूमिगत जल में नत्रजन के रिसाव को कम करता है क्योंकि इस में पोषक तत्व का इस्तेमाल केवल जड़ों में किया जाता है, जिससे यह पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में पौधों को मिलते हैं। निंदाई-गुड़ाई: फसल को खरपतवार से मुक्त रखने के लिए समय-समय पर निराई-गुड़ाई करके खरपतवार को निकालते रहना चाहिए। इसके अतिरिक्त खरपतवारनाशी जैसे पेंडिमेथेलिने 30 ई.सी. का 1.3 लीटर प्रति एकर की दर से 200 लीटर पानी मे घोलकर रोपाई के 3 दिन के अंदर छिडकाव करें या ऑक्सिफलौरफेन 23.5% ई. सी. 250 मिली प्रति एकर 200  लीटर पानी मे घोलकर रोपाई के 3 दिन के अंदर छिडकाव करें यदि खड़ी फसल में यदि खरपतवार हो तो  ऑक्सिफलौरफेन 23.5% ई. सी. 200 मिली प्रति एकर 200 लीटर पानी क्विज़लफोप इथाइल 5% ई.सी. 400 मिली प्रति एकर 200 लीटर पानी में घोलकर  रोपाई के 20 से 25 दिन बाद छिडकाव करें। खुदाई: प्याज की फसल 50 प्रतिशत गर्दन गिरने के बाद निकाली जानी चाहिए जो कि फसल परिपक्वता का संकेतक है। हालांकि, खरीफ के मौसम में 90-110 दिनों में कन्द परिपक्व हो जाते हैं, लेकिन पौधे सक्रिय विकास के चरण में ही रहते है और गर्दन गिरने के लक्षण नहीं दिखाई देते। ऐसे समय में रंगद्रव्य और प्याज के आकार को भी खरीफ मौसम के दौरान परिपक्वता के लिए सूचकांक के रूप में लिया जाता है। कन्द के संपूर्ण विकास के बाद,कटाई से दो-तीन दिन पहले गर्दन गिरावट को प्रेरित करने के लिए खाली ड्रम घुमाना चाहिए। कटे हुए कन्द को तीन दिनों के लिए खेतों में सूखने के लिए छोड़ देना जाना चाहिए
26-Mar-2018 08:47
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विजयपाल सिंह जी नमस्कार। प्याज की उन्नत  खेती: प्‍याज की खेती  भारत के सभी भागों मे सफलता पूर्वक की जाती है। प्याज एक नकदी फसल है जिसमें विटामिन सी, फास्फोरस आदि पौष्टिक तत्व प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। इसका प्याज का उपयोग सलाद, सब्जी, अचार एवं मसाले के रूप में किया जाता है। गर्मी में लू लग जाने तथा गुर्दे की बीमारी में भी प्याज लाभदायक रहता है। भारत में रबी तथा खरीफ दोनो ऋतूओं मे प्‍याज उगाया जा सकता है। जलवायु: प्याज शीतोष्ण जलवायु की फसल है लेकिन इसे उपोष्णकटिबंधीय और उष्णकटिबंधीय जलवायु में भी लगाया जा सकता है। हल्के मौसम में इसकी अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है जब न अत्यधिक गरमी या ठंड हो और न ही अत्यधिक वर्षा। वैसे, प्याज के पौधे मजबूत होते हैं और युवा अवस्था में ठंडे तापमान का भी सामना कर सकते हैं। भारत में लघु दिवस प्याज मैदानों में लगाया जाता है, जिसे 10-12 घंटे लंबे दिन की आवश्यकता होती है। दीर्घ दिवस प्याज को 13-14 घंटे प्रकाश दिन की आवश्यकता होती है और यह पहाड़ियों में उगाया जाता है। वनस्पति विकास के लिए, कम प्रकाश समय के साथ कम तापमान की आवश्यकता होती है, जबकि उच्च तापमान के साथ लंबा प्रकाश समय प्याज के विकास और परिपक्वता के लिए आवश्यक है। वनस्पति चरण और प्याज के विकास के लिए अनुकूलतम तापमान क्रमशः 13-24 डिग्री सें.और 16-25 डिग्री सें. है। इसकी अच्छी वृध्दि के लिए 70सापेक्ष आर्द्रता की आवश्यकता होती है। जहाँ मानसून के दौरान अच्छे वितरण के साथ औसतन वार्षिक वर्षा 650-750 मि.मी. हो वहाँ प्याज की उपज अच्छी आती है। कम (<650 मीमी) या भारी (>750 मीमी) वर्षा के क्षेत्र इस फसल के लिए उपयुक्त नहीं है।   मृदा: प्याज सभी प्रकार की मिट्टी में उगाई जा सकती है जैसे कि रेतीली, दोमट, गाद दोमट और भारी मिट्टी। सफल प्याज की खेती के लिए सबसे अच्छी मिट्टी दोमट और जलोढ़ हैं जिसमें जल निकासी प्रवृत्ती के साथ अच्छी नमी धारण क्षमता और पर्याप्त कार्बनिक पदार्थ हों। भारी मिट्टी में उत्पादित प्याज खराब हो सकते हैं। वैसे भारी मिट्टी पर भी प्याज सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है, अगर खेती के लिए क्षेत्र की तैयारी बहुत अच्छी हो और रोपन से पहले जैविक खाद का प्रयोग किया जाए। प्याज की फसल के लिए मृदा सामू इष्टतम 6.0 - 7.5 होना चाहिए,लेकिन प्याज हल्के क्षारीय मिट्टी में भी उगाया जा सकताहै। प्याज की फसल अत्यधिक अम्लीय, क्षारीय और खारी मिट्टी और जल जमाव के लिए अधिक संवेदनशील है। प्याज 6.0 के नीचे सामू की मिट्टी में सूक्ष्म तत्व की कमी की वजह से  या कभी-कभी ॲल्युमिनीयम या मैगनीज विषाक्तता होने के कारण कामयाब नहीं है। उन्नत किस्में: खरीफ में बुवाई हेतु: एग्रीफाउंड डार्क रेड, भीमा सुपर, भीम डार्क रेड। रबी में बुआई हेतु: एग्रीफाउंड लाइट रेड, एग्रीफाउंड रोज, भीमा रेड, भीमा शक्ति,  पूसा रेड, पूसा रतनार। सफेद प्याज की किस्में: पूसा व्हाइट राउंड, पूसा व्हाइट फ्लैट, भीमा श्वेता, भीमा शुभ्रा। बीज की बुवाई: प्याज की बुवाई खरीफ मौसम में  मई के अन्तिम सप्ताह से लेकर जून के मध्य तक करते हैं। रबी फसल हेतु नर्सरी में बीज की बुवाई नवम्बर-दिसम्बर में करनी चाहिए। पौध तैयार करना: उचित पौधशाला प्रबंधन और रोपाई का प्याज की फसल में महत्वपूर्ण योगदान है। लगभग 0.05 हेक्टेयर क्षेत्र की पौधशाला 1 हेक्टेयर में रोपाई हेतु पर्याप्त है। इसके लिए खेत की 5-6 बार जुताई करना चाहिए जिससे ढ़ेले टूट जाए और मिट्टी भूरभूरी होकर अच्छी तरह से पानी धारण कर सके। भूमि की तैयारी से पहले पिछली फसल के बचे हुए भाग, खरपतवार और पत्थर हटा देने चाहिए। आखिरी जुताई के समय आधा टन अच्छी तरह से सड़ी हुइ गोबर की खाद 0.05 हेक्टेयर में मिट्टी के साथ अच्छी तरह से मिलाना चाहिए। पौधशाला के लिए 10-15 सें.मी. ऊंचाई, 1मी. चौड़ाई और सुविधा के अनुसार लंबाई की उठी हुई क्यारियां तैयार की जानी चाहिए। क्यारियों के बीच की दूरी कम से कम 30 सेमी होनी चाहिए, जिससे एक समान पानी का बहाव हो सके और अतिरिक्त पानी की निकासी भी संभव हो। उठी हुई क्यारियों की पौधशाला के लिए सिफारिश की गई है, क्योंकि समतल क्यारियों में ज्यादा पानी की वजह से बीज बह जाने का खतरा रहता है। लगभग 10 कि.ग्रा. बीज एक हेक्टेयर में पौध के लिए आवश्यक है। बुवाई से पहले बीज को  थाइरम 2 ग्राम /कि.ग्रा. बीज कार्वेनिन्डाजिम 1 ग्राम प्रति किलो ग्राम की दर से उपचार करें या ट्रायकोडरमा विरीडी 4 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजउपचार करें।  बीज 50 मि.मी. से 75 मि.मी. पर कतार में बोया जाना चाहिए जिससे बीज बुवाई के बाद रोपाई, निराई और कीटनाशकों का छिड़काव आसानी से हो सके। बुवाई के बाद बीज को सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट से ढका जाना चाहिए और फिर हल्के पानी का छिड़काव करना चाहिए। टपक या सुक्ष्म फव्वारा प्रणाली के माध्यम से सिंचाई करने पर पानी की बचत होती है। पौधशाला में मेटालेक्सिल 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के पर्णीय छिड़काव का मृदा जनित रोगों को नियंत्रित करने के लिए सिफारिश की गई है। कीड़ों का प्रकोप अधिक होने पर फिप्रोनील 1 मिली प्रति लीटर का पत्तों पर छिड़काव करना चाहिए। प्याज के पौध खरीफ में 35-40 दिनों में और पछेती खरीफ एवं रबी में 45-50 दिनों में रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं। खाद उर्वरक: प्याज की फसल से  भरपूर उत्पादन प्राप्त करने हेतु खाद एवं उर्वरको का उपयोग मृदा परीक्षण की अनुशंसा के अनुसार करें। सामान्तया अच्छी फसल लेने के लिये 100 क्विंटल प्रति एकर अच्छी सड़ी गोबर खाद प्रति हेक्टेयर की दर से खेत की अंतिम तैयारी के समय मिला दें। इसके अलावा 50 किलोग्राम DAP, 40 किलोग्राम यूरिया,  40 किलोग्राम मयूरेट ऑफ पोटाश, 10 किलोग्राम जिंक सलफेट, 20 किलोग्राम बेंटोनाइट सल्फर 90% प्रति एकर रोपाई के पूर्व देवें। प्याज में 25 किलोग्राम यूरिया प्रति एकर रोपाई के 30 दिन बाद तथा 25 किलोग्राम यूरिया रोपाई के 45 दिन बाद छिड़ककर दें। प्याज की अच्छी उपज हेतु  घुलनशील उर्वरकों का पर्णीय छिडकाव: यदि वानस्पतिक वृद्धी कम हो तो 19:19:19 पानी मे घुलनशील उर्वरक 1 किलोग्राम प्रति एकर 200 लीटर पानी मे घोलकर रोपाई के 15, 30 एवं 45 दिन बाद छिडकाव करें। इसके बाद 13:0:45 पानी मेे घुलनशील उर्वरक 1 किलोग्राम प्रति एकर 200 लीटर पानी मे घोलकर रोपाई के 60, 75 एवं 90 दिन बाद छिडकाव करें। अच्छी उपज व गुणवत्ता के लिए सूक्ष्म पोषक तत्वों का मिश्रण 200 ग्राम प्रति एकर 200 लीटर पानी मे घोलकर रोपाई के 45 और 60 दिन बाद छिडकाव करें। धन्यवाद। जैव उर्वरक: जैविक उर्वरकों में सूक्ष्मजीव उपस्थित होते हैं। जैविक उर्वरकों का उपयोग बीज उपचार या फिर मिट्टी में डालने के लिए किया जाता है। जब इन्हें बीज या मिट्टी में डालते हैं, तब इनमें उपस्थित सूक्ष्म जीव नत्रजन  स्थिरीकरण, फॉस्फोरस घुलनशीलता और दूसरे विकास वर्धक पदार्थों द्वारा प्राथमिक पोषक तत्वों की उपलब्धता में वृद्धि करते है जिससे पौंधौं का विकास होता है। प्या.ल.अनु.नि. में किए गए प्रयोगों के आधार पर, जैविक उर्वरक  ऐजोस्पाइरिलियम और फॉस्फोरस घोलनेवाले जीवाणु की 5 कि.ग्रा./हे. की दर से प्याज फसल के लिए सिफारिश की गई है। ऐजोस्पाइरिलियम जैविक नत्रजन स्थिरीकरण द्वारा मिट्टी में नत्रजन की उपलब्धता को बढ़ाते हैं और फास्फोरस घोलनेवाले जीवाणु के इस्तेमाल से मृदा में मौजूद अनुपलब्ध फॉस्फोरस पौधों के लिए उपलब्ध होते हैं जिससे फास्फोरस उर्वरकों की क्षमता बढ़ती है। पौध रोपण: रोपाई के लिए पौध का चयन करते समय ऊचित ध्यान रखना चाहिए। कम और अधिक आयु के पौध रोपाई के लिए नहीं लेने चाहिए। रोपाई के समय पौध के शीर्ष का एक तिहाई भाग काट देना चाहिए जिससे उनकी अच्छी स्थापना हो सके। प्याज की पौध स्थापना के दौरान फफूंदी संबंधी रोगों की घटनाओं को कम करने के लिए पौध की जड़ों कों कार्बेण्डाज़िम घोल (2 ग्राम प्रति लीटर पानी) में दो घंटें के लिए डूबाने के बाद रोपित किया जाना चाहिए। रोपाई के समय पंक्तियों के बीच 15 सें.मी. और पौधों के बीच 10 सें.मी. इष्टतम अंतर होना चाहिए। सिंचाई: मौसम, मिट्टी का प्रकार, सिंचाई की विधि और फसल की आयु पर प्याज में सिंचाई की आवश्यकता निर्भर करती है। आम तौर पर  रोपाई के समय, रोपाई से तीन दिनों बाद और मिट्टी की नमी के आधार पर 7-10 दिनों के अंतराल पर सिंचाई की जरूरत होती है। खरीफ फसल में 5-8 बार, पछेती  खरीफ फसल में 10-12 बार और रबी की फसल में 12-15 बार सिंचाई की जरूरत है।  प्याज एक उथले जड़ की फसल है जिसकी उचित वृद्धि और कन्द विकास हेतु इष्टतम मिट्टी की नमी बनाए रखने के लिए लगातार हल्के सिंचाई की जरूरत होती है। फसल परिपक्व होने के पश्चात (फसल कटाई से 10-15 दिन पहले) सिंचाई बंद करनी चाहिए। इससे भंडारण के दौरान सड़न को कम करने में मदद मिलती है। अतिरिक्त सिंचाई प्याज की फसल के लिए हानिकारक होती है तथा शुष्क समय के बाद सिंचाई करने से दुफाड कन्द बनते है। प्याज में टपक सिंचाई: आधुनिक सिंचाई तकनीक जैसे टपक सिंचाई और फव्वारा सिंचाई से पानी की बचत और प्याज की विपणन योग्य उपज में बढ़ौतरी होती है। टपक सिंचाई में, पौध को 15 सें.मी. ऊंची, 120 सें.मी. चौड़ी क्यारियों में 10 x 15 सें.मी. की दूरी पर लगाना चाहिए। हर चौड़ी उठी हुई क्यारी में 60 सें.मी. की दूरी पर दो टपक लेटरल नलियां (16 मि.मी. आकार) अंतर्निहित उत्सर्जकों के साथ होनी चाहिए। दो अंतर्निहित उत्सर्जकों के बीच की दूरी 30-50 सें.मी. और प्रवाह की दर 4 ली./घंटा होनी चाहिए। फव्वारा सिंचाई प्रणाली: फव्वारा सिंचाई प्रणाली में दो लेटरल (20 मि.मी.) के बीच की दूरी 6 मी. और निर्वहन दर 135 लि./घंटा होनी चाहिए। शोध परिणामों से पता चलता है कि बाढ़ सिंचाई की तुलना में टपक सिंचाई से ए श्रेणी के कन्द की अधिकता, 35-40% पानी की बचत और 20-30%श्रम की बचत के साथ कन्द उपज में 15-25% वृध्दि होती है।   फर्टीगेशन: उर्वरकों को टपक सिंचाई द्वारा इस्तेमाल करना एक प्रभावी और कारगर तरीका है। इसमें पानी को पोषक तत्वों के वाहक एवं वितरक के रुप में उपयोग किया जाता है। उच्च विपणन योग्य कन्द उपज और मुनाफा प्राप्त करने के लिए 40 कि.ग्रा. नत्रजन रोपाई के समय आधारीय मात्रा के रूप में और शेष नत्रजन का उपयोग छह भागों में, रोपाई से 60 दिनों बाद तक 10 दिनों के अंतराल पर टपक सिंचाई के माध्यम से किया जाना चाहिए। टपक सिंचाई प्रणाली न केवल पानी की बचत करने में मदद करता है बल्कि भूमिगत जल में नत्रजन के रिसाव को कम करता है क्योंकि इस में पोषक तत्व का इस्तेमाल केवल जड़ों में किया जाता है, जिससे यह पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में पौधों को मिलते हैं। निंदाई-गुड़ाई: फसल को खरपतवार से मुक्त रखने के लिए समय-समय पर निराई-गुड़ाई करके खरपतवार को निकालते रहना चाहिए। इसके अतिरिक्त खरपतवारनाशी जैसे पेंडिमेथेलिने 30 ई.सी. का 1.3 लीटर प्रति एकर की दर से 200 लीटर पानी मे घोलकर रोपाई के 3 दिन के अंदर छिडकाव करें या ऑक्सिफलौरफेन 23.5% ई. सी. 250 मिली प्रति एकर 200  लीटर पानी मे घोलकर रोपाई के 3 दिन के अंदर छिडकाव करें यदि खड़ी फसल में यदि खरपतवार हो तो  ऑक्सिफलौरफेन 23.5% ई. सी. 200 मिली प्रति एकर 200 लीटर पानी क्विज़लफोप इथाइल 5% ई.सी. 400 मिली प्रति एकर 200 लीटर पानी में घोलकर  रोपाई के 20 से 25 दिन बाद छिडकाव करें। खुदाई: प्याज की फसल 50 प्रतिशत गर्दन गिरने के बाद निकाली जानी चाहिए जो कि फसल परिपक्वता का संकेतक है। हालांकि, खरीफ के मौसम में 90-110 दिनों में कन्द परिपक्व हो जाते हैं, लेकिन पौधे सक्रिय विकास के चरण में ही रहते है और गर्दन गिरने के लक्षण नहीं दिखाई देते। ऐसे समय में रंगद्रव्य और प्याज के आकार को भी खरीफ मौसम के दौरान परिपक्वता के लिए सूचकांक के रूप में लिया जाता है। कन्द के संपूर्ण विकास के बाद,कटाई से दो-तीन दिन पहले गर्दन गिरावट को प्रेरित करने के लिए खाली ड्रम घुमाना चाहिए। कटे हुए कन्द को तीन दिनों के लिए खेतों में सूखने के लिए छोड़ देना जाना
26-Mar-2018 08:46
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लोकेश जी नमस्कार। जैविक खेती मानव स्वास्थ्य, मृदा स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए लाभप्रद है। जैविक खेती करने के लिए हमे जैविक संसाधनों की जरूरत पड़ेगी मुख्य रूप से देशी गाय की। फसलों  में पोषक तत्वों के प्रबंधन हेतु लगभग 100 क्विंटल गोबर की खाद या 20 क्विंटल केंचुआ खाद एवं दीमक एवं अन्य भूमिगत कीटों के नियंत्रण के लिए 200   किलोग्राम नीम खली प्रति एकर की दर से उपयोग करें। साथ ही फसल चक्र, मिश्रित फसल पद्धति, रोग एवं कीटों के प्रति निरोधक किस्मों का उपयोग करें। रोगों की रोकथाम हेतु गौ मूत्र 10 लीटर प्रति एकर 200 लीटर पानी में घोलकर 15 दिन में एक बार छिडकाव करें कीटों की रोकथाम के लिए पांच पत्ती काडा 5 लीटर प्रति एकर 200 लीटर पानी मे घोलकर 15 दिन में एक बार पौधों पर छिड़काव करें एवं छाछ 5 लीटर प्रति एकर 200 लीटर पानी मे घोलकर 15 दिन मे एक बार छिड़काव करना लाभप्रद होगा। एवं  रस चूसक कीटों के नियंत्रण के लिए 10 पीले एवं 10 नील चिप चिपे कार्ड प्रति एकर की दर से खेत मे लगावें।  साथ ही मृदा में  सूक्ष्म जीवों की वृद्धि के लिए जीवामृत 200 लीटर प्रति एकर सिचाई के साथ 15 दिन में एक बार देवें। साथ ही प्रकाश प्रपंच, फेरोमोन ट्रैप, जैव उर्वरकों जैसे राइजोबियम कल्चर, पीएसबी कल्चर 5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजउपचार करें या 1 किलोग्राम प्रति एकर 25 किलोग्राम गोबर की खाद में मिलाकर खेत मे देवें। जैविक कीट नाशको, जैसे नीम तेल 1 लीटर प्रति एकर 200 लीटर पानी या वर्टिसिलियम लेकेनाइ 1 किलोग्राम प्रति एकर या बेवेरिया वेसियाना 1 किलोग्राम प्रति एकर 200 लीटर पानी मे घोलकर छिडकाव करें। जैविक फफूँद नाशको ट्राइकोडर्मा विरडी 5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजउपचार करें एवं 1 किलोग्राम प्रति एकर 25 किलोग्राम गोबर की खाद में मिलाकर खेत मे देवें। इस तरह से  हम फसलों की जैविक खेती कर सकते हैं। धन्यवाद।
26-Mar-2018 08:44
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संतोष जी नमस्कार। पपीता की उन्नत खेती: पपीता, विश्व के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जाने वाला महत्वपूर्ण फल है।केला के पश्चात् प्रति ईकाई अधिकतम उत्पादन देने वाली एवं औषधीय गुणों से भरपूर फलदार पौधा है। जलवायु एवं भूमि: पपीता एक उष्णकटिबंधीय जलवायु वाली फसल है जिसको मध्यम उपोष्ण जलवायु जहॉ तापमान 10-26 डिग्री सेल्सियस तक रहता है तथा पाले की संभावना न हो, इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है।पपीता के बीजों के अंकुरण हेतु 30 डिग्री सेल्सियस तापमान सर्वोत्तम होता है।ठंड में रात्रि का तापमान 5 डिग्री सेल्सियस से कम होने पर पौधों की वृद्धि तथा फलोत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।पपीता की खेती के लिए 6.5-7.5 पी.एच मान वाली हल्की दोमट या दोमट मिट्टी जिसमें जल निकास अच्छा हो सर्वाधिक उपयुक्त होती है। उन्नत किस्में: पपीता की उन्नत किस्में: पूसा डेलिशियस, पूसा मैजेस्टी, सूर्या, रेड लेडी 786 आदि। रेड लेडी 786: पपीता की यह संकर किस्म है।  इसके पौधे    गायनोडिओसिस होते है। अर्थात पौधों में मादा एवं उभयलिंगी फूल आते है।जिसके कारण प्रत्येक पौधा फल देता है प्रति पौधा औसतन  30 से 40  फल  एक फसल मौसम में प्राप्त हो जाते है। फल औसतन 1.5  से 2 किलोग्राम वजन के होते है। गूदा अंदर से नारंगी-लाल एवं  मीठा होता है। फलों की भंडारण क्षमता अच्छी होती है। पपीते की पोध तैयारी करने की तकनीक तथा बीज की मात्रा: पपीते के 1 एकर  के लिए आवश्यक पौधों की संख्या तैयार करने के लिए परंपरागत किस्मों का 200 ग्राम बीज एवं संकर किस्मों का 30 ग्राम बीज की मात्रा की आवश्यकता होती है।पपीते की पौध क्यारियों एवं पालीथीन की थैलियों में तैयार की जा सकती है। क्यारियों में पौध तैयार करने हेतु क्यारी की लंबाई 3 मीटर, चैड़ाई 1 मीटर एवं ऊंचाई 20 सेमी रखें।प्लास्टिक की थैलियों में पौध तैयार करने के लिए 200 गेज मोटी 20 X 15 सेमी आकर की थैलिया (जिनमें चारों तरफ एवं नीचे छेद किए गए हो) में  रेत, गोबर खाद तथा मिट्टी के 1:1:1 अनुपात का मिश्रण भरकर प्रत्येक थैली में 1 बीज बोंए। खेत की तैयारी तथा रोपण तकनीक: पौध रोपण पूर्व खेत की तैयारी मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई कर 2-3 बार कल्टिवेटर या हैरो से जुताई करें।तथा समतल कर लें । पूर्ण रूप से तैयार खेत में 45 x 45 x 45 सेमी आकार के गढडे 2x2 मीटर (पंक्ति से पंक्ति एवं पौध से पौध ) की दूरी पर तैयार करें। पोषक तत्व प्रबंधन तकनीक: खाद एवं उर्वरको का उपयोग मृदा परीक्षण के बाद ही करें। सामान्तया तैयार किये गड्ढ़ों में गोबर की खाद 5 किलोग्राम ट्राइकोडर्मा 25 ग्राम, नीम खली 500 ग्राम, सिंगल सुपर फॉस्फेट 500 ग्राम, मयूरेट ऑफ पोटाश 250 ग्राम प्रति गड्ढा ऊपर की मिट्टी में मिलाकर गढ्डों को भर देवें। इसके बाद 200 ग्राम नत्रजन, 250 ग्राम फास्फोरस और 250 ग्राम पोटाश  प्रति पौधा प्रतिवर्ष 3-4 बराबर भागों में बांटकर दें। रोपण का समय: पपीते के पौधे पहले रोपणी में तैयार किये जाते है, पौधे पहले से तैयार किये गढ्ढे में जून, जुलाई में लगाना चाहिए, जंहा सिंचाई का समूचित प्रबंध हो वहाँ पर सितम्‍बर से अक्‍टूबर तथा फरवरी से मार्च तक पपीते के पौधे लगाये जा सकते है। सिंचाई एवं खरपतवार प्रबंधन तकनीक: पपीता के पौधो की अच्छी वृद्धि तथा अच्छी गुणवत्तायुक्त फलोत्पादन हेतु मिटटी में सही नमी स्तर बनाए रखना बहुत जरूरी होता है। नमी की अत्याधिक कमी का पौधों की वृद्धि फलों की उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।सामान्यतः शरद ऋतु में 10-15 दिन के अंतर से तथा ग्रीष्म ऋतु में 5-7 दिनों के अंतराल पर आवष्यकतानुसार सिंचाई करें।सिंचाई की आधुनिक विधि ड्रिप तकनीकी अपनाऐ। अंतःवर्तीय फसल: पपीते बाग में अंतःवर्तीय फसलों के रूप में दलहनी फसलों जैसे मटर, मैथी, चना, फ्रेंचबीन व सोयाबीन आदि ली जा सकती।मिर्च, टमाटर, बैंगन, भिण्डी आदि फसलों को पपीते पौधों के बीच अंतःवर्तीय फसलों के रूप में न उगायें। फलों की तुड़ाई: पौधे लगाने के 8 से 9 माह बाद फल तोडने लायक हो जाते है। फलों का रंग गहरा हरे रंग से बदलकर हल्‍का पीला होने लगता है तथा फलों पर नाखुन लगने से दूध की जगह पानी तथा तरल निकलता हो तो समझना चाहिए कि फल पक गया होगा। फलो को सावधानी से तोडना चाहिए। छोटी अवस्‍था में फलों की छटाई अवश्‍य करना चाहिए। फलो की तुड़ाई तथा श्रेणीकरण एवं पैकिंग: पपीता के पूर्ण रूप से परिपक्व फलोंको जबकि फल के शीर्ष भाग में पीलापन शुरू हो जाए तब डण्ढल सहित तुड़ाई करें। तुड़ाई के पश्चात् स्वस्थ, एक से आकार के फलों को अलग कर लें तथा सड़े गले फलों को अलग हटा दें। उपज: एक एकर  से 350 से 400 क्विंटल पपीते का उत्पादन  हो जाता है। रोग प्रबंधन: पपीते के पौधों में मुजैक, लीफ कर्ल, रिंगस्पॉट, जड़ एवं तना सडन ,एन्थ्रेक्नोज एवं कली तथा पुष्प वृंत का सड़ना आदि रोग लगते है। इनके नियंत्रण में वोर्डोपेस्ट का पेड़ो पर सडन गलन को खरोचकर लेप करना चाहिए अन्य रोग के लिए कापर ऑक्सि क्लोराइड 500 ग्राम या मेंकॉज़ेब 400 ग्राम प्रति एकर 200 लीटर  का पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। कीट प्रबंधन: पपीते के पौधों को कीटो से कम नुकसान पहुचता है फिर भी कुछ कीड़े लगते है जैसे माहू, रेड स्पाईडर माईट, निमेटोड आदि है ।नियंत्रण के लिए डाईमेथोएट 30 ई.सी. 400 मिली लीटर प्रति एकर या इमिडाक्लोप्रिड़ 17.8 एस एल.  40 मिली प्रति एकर 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने से रस चूसक कीटों  का नियंत्रण होता है। पपीता की रेड लेडी 786 किस्म के लिए संपर्क करें। राकेश पाटीदार, ग्राम-सावदा, विकास खण्ड- कसरावद, जिला-खरगोन, मध्यप्रदेश, मोबाइल नम्बर 919575807414
26-Mar-2018 08:42
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अमित जी नमस्कार। सोयाबीन की उन्नत खेती: भूमि का चुनाव: सोयाबीन की खेती अधिक हल्की, हल्की व रेतीली भूमि को छोड़कर सभी प्रकार की भूमि में सफलतापूर्वक की जा सकती है। परंतु पानी के निकास वाली चिकनी दोमट भूमि सोयाबीन के लिये अधिक उपयुक्त होती है। जिन खेतों में पानी रुकता हो उनमें सोयाबीन न लें। भूमि की तैयारी: ग्रीष्मकालीन जुताई 3 वर्ष में कम से कम एक बार अवष्य करनी चाहिये। वर्षा प्रारम्भ होने पर 2 या 3 बार बखर तथा पाटा चलाकर खेत का तैयार कर लेना चाहिये। इससे हानि पहुंचाने वाले कीटों की सभी अवस्थायें नष्ट होंगीं। ढेला रहित और भुरभुरी मिट्टी वाले खेत सोयाबीन के लिये उत्तम होते हैं। खेत में पानी भरने से सोयाबीन की फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है अत: अधिक उत्पादन के लिये खेत में जल निकास की व्यवस्था करना आवश्यक होता है। जहां तक सम्भव हो आखरी बखरनी एवं पाटा समय से करें जिससे अंकुरित खरपतवार नष्ट हो सकें। यथा सम्भव मेंढ़ और कूड़ (रिज एवं फरों) बनाकर सोयाबीन बोयें। उन्नत किस्मे: जे.एस. 335, जेएस 95-60, जेएस 93-05, आरवीएस 2001-4    आदि। बीज दर: छोटे दाने वाली किस्में - 28 किलोग्राम प्रति एकड़। मध्यम दाने वाली किस्में - 32 किलोग्राम प्रति एकड़ बड़े दाने वाली किस्में - 35 किलोग्राम प्रति एकड़। बीजोपचार: सोयाबीन के अंकुरण को बीज तथा मृदा जनित रोग प्रभावित करते हैं। इसकी रोकथाम हेतु बीज को बीज को थायरम कार्बेन्डाजिम (2:1) के 3 ग्राम मिश्रण, अथवा थायरम कार्बोक्सीन 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिये अथवा ट्राइकोडर्मा 4 ग्राम प्रति किलों ग्राम बीज की दर से उपचारित करके बोयें। कल्चर का उपयोग: फफूंदनाशक दवाओं से बीजोपचार के प्श्चात् बीज को 5 ग्राम रायजोबियम एवं 5 ग्राम पीएसबी कल्चर प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें। उपचारित बीज को छाया में रखना चाहिये एवं शीघ्र बोनी करना चाहिये। घ्यान रहे कि फफूंद नाशक दवा एवं कल्चर को एक साथ न मिलाऐं। बोनी का समय एवं तरीका: जून के अंतिम सप्ताह में जुलाई के प्रथम सप्ताह तक का समय सबसे उपयुक्त है। बोने के समय अच्छे अंकुरण हेतु भूमि में 10 सेमी गहराई तक उपयुक्त नमी होना चाहिये। जुलाई के प्रथम सप्ताह के पश्चात् बोनी की बीज दर 5-10 प्रतिशत बढ़ा देना चाहिये। कतारों से कतारों की दूरी 30 से.मी. (बोनी किस्मों के लिये) तथा 45 से.मी. बड़ी किस्मों के लिये। 20 कतारों के बाद एक कूंड़ जल निथार तथा नमी सरंक्षण के लिये खाली छोड़ देना चाहिये। बीज 2.50 से 3 से.मी. गहरा बोयें। अंतरवर्तीय फसले: सोयाबीन के साथ अंतरवर्तीय फसलों के रुप में अरहर सोयाबीन (2:4), ज्वार सोयाबीन (2:2), मक्का सोयाबीन (2:2), तिल सोयाबीन (2:2) अंतरवर्तीय फसलें उपयुक्त हैं। समन्वित पोषण प्रबंधन: अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद (कम्पोस्ट) 20 क्विंटल प्रति एकड़ अंतिम बखरनी के समय खेत में अच्छी तरह मिला देवें तथा बोते समय 50 किलोग्राम डीएपी,  15 किलोग्राम मयूरेट ऑफ पोटाश एवं 8 किलो गंधक प्रति एकड़ देवें। यह मात्रा मिट्टी परीक्षण के आधार पर घटाई बढ़ाई जा सकती है। यथा सम्भव नाडेप, फास्फो कम्पोस्ट के उपयोग को प्राथमिकता दें। रासायनिक उर्वरकों को कूड़ों में लगभग 5 से 6 से.मी. की गहराई पर डालना चाहिये। गहरी काली मिट्टी में जिंक सल्फेट 10 किलोग्राम प्रति एकड़ एवं उथली मिट्टियों में 8 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से 5 से 6 फसलें लेने के बाद उपयोग करना चाहिये। खरपतवार प्रबंधन: फसल के प्रारम्भिक 30 से 40 दिनों तक खरपतवार नियंत्रण बहुत आवश्यक होता है। बतर आने पर डोरा या कुल्फा चलाकर खरपतवार नियंत्रण करें व दूसरी निदाई अंकुरण होने के 30 और 45 दिन बाद करें। बोने के पश्चात एवं अंकुरण के पूर्व पेंडीमेथलीन 1.3 लीटर प्रति एकड़ या 200 लीटर पानी में घोलकर फ्लैटफेन या फ्लैटजेट नोजल की सहायता से पूरे खेत में छिड़काव करे। खड़ी फसल में घांस कुल के खरपतवारों को नश्ट करने के लिये क्यूजेलेफोप इथाइल 400 मिली प्रति एकड़ 200 लीटर पानी अथवा घांस कुल और कुछ चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के लिये इमेजेथाफायर 400 मिली प्रति एकड़ 200 लीटर पानी में घोलकर बुआई के 15 से 20 दिन बाद खेत मे नमी होने पर   छिड़काव करें। सिंचाई: खरीफ मौसम की फसल होने के कारण सामान्यत: सोयाबीन को सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। फलियों में दाना भरते समय अर्थात् सितम्बर माह में यदि खेत में नमी पर्याप्त न हो तो आवश्यकतानुसार एक या दो हल्की सिंचाई करना सोयाबीन के विपुल उत्पादन लेने हेतु लाभदायक है। फसल की कटाई एवं गहाई: अधिकांश पत्तियों के सूख कर झड़ जाने पर और 10 प्रतिशत फलियां के सूख कर भूरी हो जाने पर फसल की कटाई कर लेना चाहिये। कटाई के बाद गट्ठों को 2-3 दिन तक सुखाना चाहिये। जब कटी फसल अच्छी तरह सूख जाये तो गहाई कर दोनों को अलग कर देना चाहिये। फसल गहाई थ्रेसर से करना चाहिये। संभावित उपज: 8 से 10 क्विंटल प्रति एकर।
26-Mar-2018 08:42
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Sunil Professional 588b3e4d8d071,588b33899ee56
राकेश जी नमस्कार। ग्वार की ग्रीष्मकालीन फसल की बुवाई के लिए 15 फरवरी से 15 मार्च का उपयुक्त समय है। देरी से बुवाई करने पर पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जबकि वर्षा ऋतु की फसल की बुवाई के लिए जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक उपयुक्त समय है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में जुलाई में वर्षा आगमन के साथ ही ग्वार की बुवाई कर देनी चाहिए।
26-Mar-2018 08:40
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नीरज जी नमस्कार। गन्ना में कार्बोफ्‌यूरान 3 प्रतिशत सी.जी. 13 किग्रा. प्रति एकर की दर से बुरकाव करना चाहिए या क्लोरोन्ट्रेनिलीप्रोल 18.5%एस.सी. 150 मिली प्रति एकर 400 लीटर पानी  मे घोलकर छिडकाव करें।
26-Mar-2018 08:39
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मनीष जी नमस्कार। पपीता की उन्नत खेती: पपीता, विश्व के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जाने वाला महत्वपूर्ण फल है।केला के पश्चात् प्रति ईकाई अधिकतम उत्पादन देने वाली एवं औषधीय गुणों से भरपूर फलदार पौधा है। जलवायु एवं भूमि: पपीता एक उष्णकटिबंधीय जलवायु वाली फसल है जिसको मध्यम उपोष्ण जलवायु जहॉ तापमान 10-26 डिग्री सेल्सियस तक रहता है तथा पाले की संभावना न हो, इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है।पपीता के बीजों के अंकुरण हेतु 30 डिग्री सेल्सियस तापमान सर्वोत्तम होता है।ठंड में रात्रि का तापमान 5 डिग्री सेल्सियस से कम होने पर पौधों की वृद्धि तथा फलोत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।पपीता की खेती के लिए 6.5-7.5 पी.एच मान वाली हल्की दोमट या दोमट मिट्टी जिसमें जल निकास अच्छा हो सर्वाधिक उपयुक्त होती है। उन्नत किस्में: पपीता की उन्नत किस्में: पूसा डेलिशियस, पूसा मैजेस्टी, सूर्या, रेड लेडी 786 आदि। रेड लेडी 786: पपीता की यह संकर किस्म है।  इसके पौधे    गायनोडिओसिस होते है। अर्थात पौधों में मादा एवं उभयलिंगी फूल आते है।जिसके कारण प्रत्येक पौधा फल देता है प्रति पौधा औसतन  30 से 40  फल  एक फसल मौसम में प्राप्त हो जाते है। फल औसतन 1.5  से 2 किलोग्राम वजन के होते है। गूदा अंदर से नारंगी-लाल एवं  मीठा होता है। फलों की भंडारण क्षमता अच्छी होती है। पपीते की पोध तैयारी करने की तकनीक तथा बीज की मात्रा: पपीते के 1 एकर  के लिए आवश्यक पौधों की संख्या तैयार करने के लिए परंपरागत किस्मों का 200 ग्राम बीज एवं संकर किस्मों का 30 ग्राम बीज की मात्रा की आवश्यकता होती है।पपीते की पौध क्यारियों एवं पालीथीन की थैलियों में तैयार की जा सकती है। क्यारियों में पौध तैयार करने हेतु क्यारी की लंबाई 3 मीटर, चैड़ाई 1 मीटर एवं ऊंचाई 20 सेमी रखें।प्लास्टिक की थैलियों में पौध तैयार करने के लिए 200 गेज मोटी 20 X 15 सेमी आकर की थैलिया (जिनमें चारों तरफ एवं नीचे छेद किए गए हो) में  रेत, गोबर खाद तथा मिट्टी के 1:1:1 अनुपात का मिश्रण भरकर प्रत्येक थैली में 1 बीज बोंए। खेत की तैयारी तथा रोपण तकनीक: पौध रोपण पूर्व खेत की तैयारी मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई कर 2-3 बार कल्टिवेटर या हैरो से जुताई करें।तथा समतल कर लें । पूर्ण रूप से तैयार खेत में 45 x 45 x 45 सेमी आकार के गढडे 2x2 मीटर (पंक्ति से पंक्ति एवं पौध से पौध ) की दूरी पर तैयार करें। पोषक तत्व प्रबंधन तकनीक: खाद एवं उर्वरको का उपयोग मृदा परीक्षण के बाद ही करें। सामान्तया तैयार किये गड्ढ़ों में गोबर की खाद 5 किलोग्राम ट्राइकोडर्मा 25 ग्राम, नीम खली 500 ग्राम, सिंगल सुपर फॉस्फेट 500 ग्राम, मयूरेट ऑफ पोटाश 250 ग्राम प्रति गड्ढा ऊपर की मिट्टी में मिलाकर गढ्डों को भर देवें। इसके बाद 200 ग्राम नत्रजन, 250 ग्राम फास्फोरस और 250 ग्राम पोटाश  प्रति पौधा प्रतिवर्ष 3-4 बराबर भागों में बांटकर दें। रोपण का समय: पपीते के पौधे पहले रोपणी में तैयार किये जाते है, पौधे पहले से तैयार किये गढ्ढे में जून, जुलाई में लगाना चाहिए, जंहा सिंचाई का समूचित प्रबंध हो वहाँ पर सितम्‍बर से अक्‍टूबर तथा फरवरी से मार्च तक पपीते के पौधे लगाये जा सकते है। सिंचाई एवं खरपतवार प्रबंधन तकनीक: पपीता के पौधो की अच्छी वृद्धि तथा अच्छी गुणवत्तायुक्त फलोत्पादन हेतु मिटटी में सही नमी स्तर बनाए रखना बहुत जरूरी होता है। नमी की अत्याधिक कमी का पौधों की वृद्धि फलों की उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।सामान्यतः शरद ऋतु में 10-15 दिन के अंतर से तथा ग्रीष्म ऋतु में 5-7 दिनों के अंतराल पर आवष्यकतानुसार सिंचाई करें।सिंचाई की आधुनिक विधि ड्रिप तकनीकी अपनाऐ। अंतःवर्तीय फसल: पपीते बाग में अंतःवर्तीय फसलों के रूप में दलहनी फसलों जैसे मटर, मैथी, चना, फ्रेंचबीन व सोयाबीन आदि ली जा सकती।मिर्च, टमाटर, बैंगन, भिण्डी आदि फसलों को पपीते पौधों के बीच अंतःवर्तीय फसलों के रूप में न उगायें। फलों की तुड़ाई: पौधे लगाने के 8 से 9 माह बाद फल तोडने लायक हो जाते है। फलों का रंग गहरा हरे रंग से बदलकर हल्‍का पीला होने लगता है तथा फलों पर नाखुन लगने से दूध की जगह पानी तथा तरल निकलता हो तो समझना चाहिए कि फल पक गया होगा। फलो को सावधानी से तोडना चाहिए। छोटी अवस्‍था में फलों की छटाई अवश्‍य करना चाहिए। फलो की तुड़ाई तथा श्रेणीकरण एवं पैकिंग: पपीता के पूर्ण रूप से परिपक्व फलोंको जबकि फल के शीर्ष भाग में पीलापन शुरू हो जाए तब डण्ढल सहित तुड़ाई करें। तुड़ाई के पश्चात् स्वस्थ, एक से आकार के फलों को अलग कर लें तथा सड़े गले फलों को अलग हटा दें। उपज: एक एकर  से 350 से 400 क्विंटल पपीते का उत्पादन  हो जाता है। रोग प्रबंधन: पपीते के पौधों में मुजैक, लीफ कर्ल, रिंगस्पॉट, जड़ एवं तना सडन ,एन्थ्रेक्नोज एवं कली तथा पुष्प वृंत का सड़ना आदि रोग लगते है। इनके नियंत्रण में वोर्डोपेस्ट का पेड़ो पर सडन गलन को खरोचकर लेप करना चाहिए अन्य रोग के लिए कापर ऑक्सि क्लोराइड 500 ग्राम या मेंकॉज़ेब 400 ग्राम प्रति एकर 200 लीटर  का पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। कीट प्रबंधन: पपीते के पौधों को कीटो से कम नुकसान पहुचता है फिर भी कुछ कीड़े लगते है जैसे माहू, रेड स्पाईडर माईट, निमेटोड आदि है ।नियंत्रण के लिए डाईमेथोएट 30 ई.सी. 400 मिली लीटर प्रति एकर या इमिडाक्लोप्रिड़ 17.8 एस एल.  40 मिली प्रति एकर 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने से रस चूसक कीटों  का नियंत्रण होता है। पपीता की रेड लेडी 786 किस्म के लिए संपर्क करें। राकेश पाटीदार, ग्राम-सावदा, विकास खण्ड- कसरावद, जिला-खरगोन, मध्यप्रदेश, मोबाइल नम्बर 919575807414
26-Mar-2018 08:35
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MANISH Farmer 588b3e4dbdca8,588b3389a01bc
papita ki kheti karna
26-Mar-2018 07:25
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Neeraj Farmer 588b3e4d74fa3,588b33899e44a
sir ganne ke aander kiri ho gye kya kiya jaye
26-Mar-2018 00:31
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अरुण Farmer 588b3e4d9128e,588b33899ee56
अंजीर की खेती के बारे में जानकारी दे।
25-Mar-2018 20:04
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maninder Farmer 588b3e4d73649,588b33899e44a
sir ji mai kharboje (melion ) ke khete karna chatta hu krirpa mujhe sala de
25-Mar-2018 17:59
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rakesh Farmer 588b3e4dba2a5,588b3389a01bc
gwaar ki bubaie ka sahi samay kon sa he
25-Mar-2018 17:38
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अमित Farmer 588b3e4d9015e,588b33899ee56
मुझे सोयाबीन के बारे में पूछना था
25-Mar-2018 12:50
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santosh Farmer 588b3e4d8ee75,588b33899ee56
पापीता क़ी खेती क़े बारे मे सुझाव देवे
25-Mar-2018 08:04
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Lokesh Farmer 588b3e4d8a263,588b33899ee56
jevik khad banana hai bataiye ....kon - kon sa hota he or kese bnate hai...?
25-Mar-2018 01:24
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mohanlalsaini Farmer 588b3e4dacbed,588b33899fac7
mein palak ki jankari Chahta Hoon Garmi Ke Mausam Mein
25-Mar-2018 00:11
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विजयपाल सिह Farmer 588b3e4d8a7f9,588b33899ee56
Sir mujhe onion ki kheti k bare me jankari de barish vale
24-Mar-2018 20:50
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ramvaran Farmer 588b3e4d9015e,588b33899ee56
mong ke jankari deve
24-Mar-2018 16:42
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pukhraj Farmer 588b3e4dae35d,588b33899fac7
onion ka hub ki jankari sa
24-Mar-2018 13:33
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jamu Professional 588b3e4d8e43d,588b33899ee56
disease or field crop details
24-Mar-2018 13:22
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नरेंद्र Farmer 588b3e4d68711,588b33899da5f
सर पुदीना की खेती के बारे जानकारी
24-Mar-2018 07:25
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सनी जी नमस्कार। गेंदा की उन्नत खेती: गेंदा बहुत ही उपयोगी एवं आसानी से उगाया जाने वाला फूलों का पौधा है। यह मुख्य रूप से सजावटी फसल है। यह खुले फूल, माला एवं भू-दृश्य के लिए उगाया जाता है। इसके फूल बाजार में खुले एवं मालाएं बनाकर बेचे जाते है। जलवायु: गेंदे की खेती संपूर्ण भारतवर्ष में सभी प्रकार की जलवायु में की जाती है। विशेषतौर से सम-शीतोष्ण जलवायु उपयुक्त होती है। नमीयुक्त खुले आसमान वाली जलवायु इसकी वृध्दि एवं पुष्पन के लिए बहुत उपयोगी है लेकिन पाला इसके लिए नुकसानदायक होता है। इसकी खेती सर्दी, गर्मी एवं वर्षा तीनों मौसमों में की जाती है। इसकी खेती के लिए 14.5-28.6 डिग्री सैं. तापमान फूलों की संख्या एवं गुणवत्ता के लिए उपयुक्त है जबकि उच्च तापमान 26.2 डिग्री सैं. से 36.4 डिग्री सैं. पुष्पोत्पादन पर विपरीत प्रभाव डालता है। मृदा: गेंदे की खेती विभिन्न प्रकार की मृदा में की जा सकती है। वैसे गहरी मृदा उर्वरायुक्त मुलायम जिसकी नमी ग्रहण क्षमता उच्च हो तथा जिसका जल निकास अच्छा हो उपयुक्त रहती है। विशेष रूप से बलुई-दोमट मृदा जिसका पी.एच. 7.0-7.5 सर्वोतम रहती है। खाद एवं उर्वरक: गेंदा से अच्छी उपज के लिए खाद एवं उर्वरको का उपयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करना चाहिए। सामान्यतः 100 क्विंटल सड़ी गोबर की खाद खेत की तैयारी करते समय प्रति एकर की दर से मिला देना  चाहिए इसके साथ ही अच्छी फसल के लिए 50 किलोग्राम डीएपी, 50 किलोग्राम अमोनियम सलफेट 50 किलोग्राम मयूरेट ऑफ पोटाश प्रति एकर  रोपाई के पूर्व देना चाहिए।  यूरिया 70 किलोग्राम प्रति एकर दो बार में बराबर मात्रा में बाँटकर पहली बार रोपाई के एक माह बाद तथा शेष रोपाई के दो माह बाद दूसरी बार देना चाहिए। उन्नत किस्मे: पूसा नारंगी गेंदा, पूसा बसंती गेंदा, इत्यादि। संकर किस्में: टाल येलो, मक्सिमा येलो आदि। पौध तैयार करना: गेंदे के बीज को पहले पौधशाला में बोया जाता है. पौधशाला में पर्याप्त गोबर की खाद डालकर भलीभांति जुताई करके तैयार की जाती है। मिट्टी को भुरभुरा बनाकर रेत भी डालते है तथा तैयार खेत या पौधशाला में क्यारियां बना लेते है. क्यारियां 15 सेंटीमीटर ऊंची एक मीटर चौड़ी तथा 5 से 6 मीटर लम्बी बना लेना चाहिए। इन तैयार क्यारियो में बीज बोकर सड़ी गोबर की खाद को छानकर बीज को क्यारियो में ऊपर से ढक देना चाहिए. तथा जब तक बीज जमाना शुरू न हो तब तक हजारे से सिंचाई करनी चाहिए इस तरह से पौधशाला में पौध तैयार करते है। बीजों की बुवाई : अच्छी किस्मों का चयन कर बीज शइया पर सावधानीपूर्वक बुवाई करें। ऊपर उर्वर मृदा की हल्की परत चढ़ाकर, फव्वारे से धीरे-धीरे पानी का छिड़काव कर दें। बीज की मात्रा: संकर किस्मों में 200 ग्राम बीज प्रति एकर तथा अन्य किस्मों में लगभग 500  ग्राम बीज प्रति एकर पर्याप्त होता है। बुवाई का समय: भारत वर्ष में इसकी बुवाई जलवायु की भिन्नता के अनुसार अलग-अलग समय पर होती है. उत्तर भारत में दो समय पर बीज बोया जाता है जैसे कि पहली बार मार्च से जून तक तथा दूसरी बार अगस्त से सितम्बर तक बुवाई की जाती है। पौध रोपण : अच्छी तरह तैयार क्यारियों में गेंदे के स्वस्थ पौधों को जिनकी 3-4 पत्तियां हों पौध रोपण हेतु प्रयोग करें। जहां तक संभव हो पौध रोपाई शाम के समय ही करेुं तथा रोपाई के पश्चात् चारों तरफ मिट्टी को दबा दें ताकि जड़ों में हवा न रहे एवं हल्की सिंचाई करें। पौधे से पौधे की दूरी: गेंदा के पौधों की रोपाई समतल क्यारियो में की जाती है रोपाई की दूरी उगाई जाने वाली किस्मों पर निर्भर करती है. अफ्रीकन गेंदे के पौधों की रोपाई में 60 सेंटीमीटर लाइन से लाइन  तथा 45 सेंटीमीटर पौधे से पौधे की दूरी रखते है तथा अन्य किस्मों की रोपाई में 40 सेंटीमीटर पौधे से पौधे तथा लाइन से लाइन की दूरी रखते है। सिंचाई: गेंदा एक शाकीय पौधा है। अत: इसकी वानस्पतिक वृध्दि बहुत तेज होती है। सामान्य तौर पर यह 55-60 दिन में अपनी वानस्पतिक वृध्दि पूरी कर लेता है तथा प्रजनन अवस्था में प्रवेश कर लेता है। सर्दियों में सिंचाई 10-15 दिन के अंतराल पर तथा गर्मियों में 5-7 दिन के अंतराल पर करें। पिंचिंग (शीर्ष कर्तन): पौधे के शीर्ष प्रभाव को खत्म करने के लिए पौध रोपाई के 35-40 दिन बाद पौधों को ऊपर से चुटक देना चाहिए जिससे पौधों की बढ़वार रूक जाती है। तने से अधिक से अधिक संख्या में शाखाएं प्राप्त होती है तथा प्रति इर्का क्षेत्र में अधिक से अधिक मात्रा में फूल प्राप्त होते हैं। खरपतावार नियंत्रण: गेंदा के खेत को खरपतवारो से साफ़ सुथरा रखना चाहिए तथा निराई-गुड़ाई करते समय गेंदा के पौधों पर 10 से 12 सेंटीमीटर ऊंची मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए जिससे कि पौधे फूल आने पर गिर न सके। फूलों की तुड़ाई: पूरी तरह खिले फूलों को दिन के ठण्डे मौसम में यानि कि सुबह जल्दी या शाम के समय सिंचाई के बाद तोड़े ताकि फूल चुस्त एवं दूरुस्त रहें। पैकिंग : ताजा तोड़े हुए फूलों को बांस की टोकरियों या थैलों में अच्छी तरह से पैक करके तुरंत मण्डी भेजें। उपज : गेंदे की उपज भूमि की उर्वरा शक्ति तथा फसल की देखभाल पर निर्भर करती है इसके साथ ही सभी तकनीकिया अपनाते हुए आमतौर पर उपज के रूप में 50 से 60 कुंतल प्रति एकर फूल प्राप्त होते है कुछ उन्नतशील किस्मों से पुष्प उत्पादन 100 कुंतल प्रति एकर प्राप्त होते है यह उपज पूरी फसल समाप्त होने तक प्राप्त होती है।
23-Mar-2018 21:51
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किंडर जी नमस्कार । टमाटर की उन्नत खेती: जलवायु: टमाटर के लिए मध्यम ठण्डा वातावरण उपयुक्त होता है। तापकृम कम हो जाने से अथवा पाले से पौधे मर जाते हैं। टमाटर की अच्छी उपज में तापमान का बहुत बड़ा योगदान होता है । फसल के लिए आदर्श तापमान 20-25 डिग्री सेन्टीग्रेट होता है । तापमान अधिक होने पर फूल एवं अपरिपक्व अवस्था मे  टूटकर गिरने लगते है । जब तापक्रम 13 डिग्री से कम एवं 35 डिग्री से ज्यादा होता है, तब परागकण का अंकुरण बहुत कम हो जाता है। टमाटर का पौधा ज्यादा ठंड और उच्च नमी को बर्दाश्त नहीं कर पाता है। ज्यादा रोशनी से इसकी रंजकता, रंग और उत्पादकता प्रभावित होता है। विपरीत मौसम की वजह से इसकी खेती बुरी तरह प्रभावित होती है। मृदा: खनिजीय मिट्टी और चिकनी बलुई मिट्टी में टमाटर की खेती अच्छी होती है लेकिन टमाटर के पौधों के लिए सबसे अच्छी बेहतर जल निकासी वाली बलुई मिट्टी होती है। मिट्टी का ऊपरी हिस्सा थोड़ा बलुई और उससे नीचे की मिट्टी अच्छी गुणवत्ता वाली होनी चाहिए। अच्छी फसल के लिए मिट्टी की गहराई 15 से 20 सेमी होनी चाहिए। खारी मिट्टी वाली जमीन में अच्छे से जड़ पकड़ सके और बेहतर ऊपज हो उसके लिए गहरी जुताई जरूरी होती है। टमाटर सामान्य तौर पर पीएच यानी अम्लीयता और क्षारीयता की बड़ी मात्रा को सहनेवाली फसल है। इसकी खेती के लिए 5.5 से 6.8 का पीएच सामान्य है। पर्याप्त पोषक तत्वों के साथ अम्लीय मिट्टी में टमाटर की फसल अच्छा होती है। टमाटर सामान्य तौर पर 5.5 पीएच वाली अम्लीय मिट्टी को सहने की क्षमता रखता है। नमक की मात्रा से रहित, हवा और पानी की पर्याप्त मात्रा को वहन करनेवाली मिट्टी टमाटर की खेती के लिए उपयुक्त होती है। ज्यादा आर्द्रता और पोषक तत्वों से रहित उच्च कार्बनिक तत्वों वाली मिट्टी इसकी खेती के लिए अच्छी नहीं होती है। वहीं, अगर खनिज पदार्थ से युक्त मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ मिल जाए तो अच्छा परिणाम देती है। उन्नत किस्में: काशी विशेष, काशी अमृत, काशी हेमंत, काशी अनुपम,  अर्का सौरभ, अर्का विकास, अर्का आहूति, अर्का आशीष, अर्का आभा, अर्का आलोक, एच एस 101, एच एस 102, एच एस 110, हिसार अरुण, हिसार लालिमा, हिसार ललित, हिसार अनमोल, के एस. 2, नरेन्द्र टोमैटो 1, नरेन्द्र टोमैटो 2, पुसा रुबी, पुसा गौरव, एस 12, पंत बहार, पंत टी 3, सोलन गोला आदि। टमाटर की संकर किस्में: अर्का रक्षक, पूसा हाइब्रिड-2, पूसा हाइब्रिड-4, पूसा हाइब्रिड-8 आदि। प्राइवेट कंपनी की संकर किस्मे: TO-2048, TO- 1057, हिमशिखर, हिमसोना (सिंजेंटा), NS 510 ( नामधारी) आदि। अर्का रक्षक: यह टमाटर के तीन प्रमुख रोग लीफ कर्ल, वायरस, बैक्टीरियल विल्ट और अगेती झुलसा के लिए प्रतिरोध के साथ एक उच्च उपज F1 संकर है। पौधे गहरे हरे रंग के पत्ते के आवरण के साथ अर्द्ध-निर्धारित होते हैं। हल्के हरे रंग के कंधे के साथ फल आयताकार होते हैं I फल मध्यम आकार के बड़े आकार (80-100 ग्रा), गहरे लाल, अच्छी गुणवत्ता (15-20 दिन) और लंबी परिवहन क्षमता के लिए उपयुक्त होते  हैं। ताजा बाजार और प्रसंस्करण दोनों के लिए इस किस्म को विकसित किया गया है। गर्मियों, खरीफ और रबी मौसम के लिए उपयुक्त है।  140-150 दिनों में 90-100 टन प्रति हेक्टेयर पैदावार देने की क्षमता है। बुआई का समय: देश के उत्तरी मैदानी भाग में इसकी दो फसल होती है लेकिन बेहद ठंडे इलाके में रबी फसल इतनी अच्छी नहीं होती है। टमाटर की रोपाई जुलाई- अगस्त एवं अक्टूबर- नवम्बर  में की जाती है। टमाटर की बीज की बुआई एवं पौध की  रोपाई: प्रति एकर बीज दर उन्नत किस्मों के लिए 200 ग्राम एवं संकर क़िस्मों के लिए 60 होता है। बीज के साथ पैदा होने वाले रोग से बचाव के लिए बीज को थाइरम 3 ग्राम प्रति किलोग्राम दर से उपचारित करना जरूरी होता है। शरद ऋतु की फसल के लिए बुआई जून- जुलाई  में की जाती है और वसंत ऋुतु की फसल के लिए बुआई अक्टूबर- नवंबर माह में की जाती है। पहाड़ी इलाके में बुआई मार्च-अप्रैल में की जाती है। शरद ऋतु के लिए फसलों के बीच अंतर 75×60 सेमी और वसंत ऋतु के लिए अंतर 75×45 सेमी रखना आदर्श माना जाता है। नर्सरी की तैयारी और देखभाल: टमाटर की बुआई के लिए आदर्श बीज की क्यारी 1 मीटर चौड़ी,  3 मीटर लंबी और 15 से 20 सेमी ऊंची होनी चाहिए। क्यारी से खरपतवार को अच्छी तरह से साफ कर देना चाहिए। अच्छी तरह से छाना हुआ गोबर खाद और बालू क्यारी में डालना चाहिए। उसके बाद उसकी अच्छी तरह से जुताई करें। उसके बाद कापर ऑक्सिक्लोराइड 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी क्लोरोपैरिफोस 20 ई सी. 2 मिली प्रति लीटर पानी मे घोलकर छिड़क दें। इसके एक दिन बाद क्यारी के समानांतर 10 से 15 सेमी की  दूरी पर लाइन खीचें। उसके बाद बीज उस लाइन में बुआई करें इसके बाद साफ बालू से ढंक दें और अंत में फूस से ढंक दें। रोज केन से सिंचाई करें। बीज की क्यारी को प्रति दिन दो बार तब तक सींचते रहें जब तक अंकुरण न हो जाए। बीज के अंकुरण के बाद फूस को हटा दें। जब चार-पांच पत्ते आ जाए तो इमिडाक्लोप्रिड़  17.8% एस एल 0.3 एम एल प्रति लीटर पानी मेंकॉज़ेब 75% डब्ल्यू. पी. 2 ग्राम प्रति लीटर पानी 19:19:19 पानी मे घुलनशील उर्वरक 2 ग्राम प्रति लीटर पानी  मे घोलकर छिड़काव करें। 28 से 30 दिनों बाद पौध रोपाई के लिए तैयार हो जाती है। खाद एवं उर्वरक: टमाटर के अच्छे उत्पादन के लिए खाद एवं उर्वरकों का उपयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करना चाहिए।  सामान्यतौर पर टमाटर की खेती के लिए 100 क्विंटल प्रति एकर अच्छी पकी हुई गोबर की खाद, 50 किलोग्राम डीएपी, 50 किलोग्राम अमोनियम सलफेट,  40 किलोग्राम मयूरेट ऑफ पोटाश रोपाई के पूर्व खेत मे मिलाये। यदि मृदा में ज़िंक की कमी हो तो 10 किलोग्राम ज़िंक सलफेट प्रति एकर  रोपाई के पूर्व खेत मे मिलाये। इसके बाद 35 किलोग्राम यूरिया प्रति एकर रोपाई के 30 दिन बाद और 35 किलोग्राम यूरिया प्रति एकर  रोपाई के 60 दिन के बाद देवें। इसके साथ ही जीवामृत 200 लीटर प्रति एकर 15 दिन में एक बार सिंचाई जल के साथ देवें। धन्यवाद। टमाटर की रोपाई: शीत ऋतु में पौधों के बीच 75 x 60 सेमी की दूरी रखी जाती है। वहीं, ग्रीष्म ऋतु में ये अंतराल 75 x 45 सेमी होता है। यहां हल से खींचे गए खांचे या लाइन में लगाए गए पौधे के बीच की दूरी 30 सेमी रखी जाती है। संकर क़िस्मों का रोपण: टमाटर की संकर क़िस्मों को उठी हुई बेड्स पर 120 सेमी.पंक्ति से पंक्ति एवं 30-40 सेमी. लाइन से लाइन की आपसी दूरी पर रोपण करें इस पद्धति में ड्रिप द्वारा सिंचाई की जाती है एवं पानी मे घुलनशील उर्वरकों का ड्रिप द्वारा उपयोग किया जाता है। खरपतवार का नियंत्रण: पौधारोपन के चार सप्ताह के दौरान हल्की निराई-गुड़ाई जरूरी होता है ताकि खेत से खर-पतवार को निकाला जा सके। प्रत्येक सिंचाई के बाद जब मिट्टी सूखती है तब खुरपी की मदद से मिट्टी को ढीला किया जाता है। इस दौरान जितना भी घास-फूस होता है उसे ठीक से निकाल देना चाहिए। मेट्रिब्यूज़ीन 70% डब्ल्यू. पी. 300 ग्राम प्रति एकर 200 लीटर पानी मे घोलकर  रोपाई के पूर्व छिडकाव करें। सिचाई: पौध रोपण के तुरंत बाद सिचाई करना चाहिए, अच्छा होता है यदि मेड एवं नाली बना कर पौध लगाया जाय । क्योंकि इस विधी में सिचाई जल एवं स्थान का भरपूर उपयोग होता है । शरदकालीन फसलों में 10-15 दिनों के अंतराल पर जबकि ग्रीष्मकालीन फसलों को 6-8 दिनों के अंतराल पर आवश्यकतानुसार सिचाई करना चाहिए । मिटटी चढाना व पौधों को सहारा देना (स्टेकिंग): टमाटर मे फूल आने के समय पौधो मे मिटटी चढाना एवं सहारा देना आवश्यक होता है। टमाटर की लम्बी बढने वाली किस्मो को विशेष रूप से सहारा देने की आवश्यकता होती है। पौधो को सहारा देने से फल मिटटी एवं पानी के सम्पर्क मे नही आ पाते जिससे फल सडने की समस्या नही होती है। सहारा देने के लिए रोपाई के 30 से 45 दिन के बाद बांस या लकडी के डंडो मे विभिन्न ऊंचाइयों पर छेद करके तार बांधकर फिर पौधो को तारो से सुतली को बांधते है। इस प्रक्रिया को स्टेकिंग कहा जाता है । फलों की तुड़ाई, उपज एवं विपणन: जब फलों का रंग हल्का लाल होना शुरू हो उस अवस्था मे फलों की तुडाई करें तथा फलो की ग्रेडिंग कर कीट व व्याधि ग्रस्त फलो दागी फलो छोटे आकार के फलो को छाटकर अलग करें। ग्रेडिंग किये फलों को कैरेट मे भरकर अपने निकटतम सब्जी मण्डी या जिस मण्डी मे अच्छा टमाटर का भाव हो वहा ले जाकर बेचें। टमाटर की औसत उपज 200 क्विंटल प्रति एकर होती है तथा संकर टमाटर की उपज 300 क्विंटल प्रति एकर तक हो सकती है ।
23-Mar-2018 21:42
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हेमंत जी नमस्कार। सरसों की उन्नत खेती: सरसों रबी में उगाई जाने वाली प्रमुख तिलहन फसल है।इसकी खेती सिचिंत एवं संरक्षित नमी द्वारा के बारानी क्षेत्रों में की जाती हैl   जलवाय: भारत में सरसों की खेती शरद ऋतु में की जाती है। इस फसल को 18 से 25 सेल्सियस तापमान की आवष्यकता होती है। सरसों की फसल के लिए फूल आते समय वर्षा, अधिक आर्द्रता एवं वायुमण्ड़ल में बादल छायें रहना अच्छा नही रहता है। अगर इसस प्रकार का मोसम होता हें तो फसल पर माहू या चैपा के आने का अधिक प्रकोप हो जाता हैं। मृदा: सरसों की खेती रेतीली से लेकर भारी मटियार मृदाओ में की जा सकती है। लेकिन बलुई दोमट मृदा सर्वाधिक उपयुक्त होती है। यह फसल हल्की क्षारीयता को सहन कर सकती है। लेकिन मृदा अम्लीय नही होनी चाहिए। खेत की तैयारी: सरसों का बीज छोटा होताहै, इसलिए जमीन कि 2 से 3 बार जुटाई कर मिट्टी को बारीक कर लें और फिर नमी सरंक्षित करने के लिए खेत में पाटा लगाएI उन्नतशील किस्में: सरसों की  उन्नतशील और अधिक उपज देने वाली किस्में हैं।: पूसा बोल्ड, वसुंधरा, पूसा जयकिसान, पूसा जगन्नाथ, रोहिणी, माया, पूसा मस्टर्ड 30, पूसा अग्रणी, वरदान,लक्ष्मी, RH – 749, RH – 406,RVM– 2, RVM – 4, DMH – 1 एवं NRCHB आदि। बीज दर: बीज 2 किलोग्राम प्रति एकर की दर से बोते हैं। मिटटी में अपर्याप्त नमी, बीज की दशा अच्छी न होने व उगने के उपरांत कीट व अन्य प्रकोपों को ध्यान में रखते हुए बीज की मात्रा उसी अनुसार बड़ाई जा सकती है बीज उपचार: भरपूर पैदावार हेतु फसल को बीज जनित बीमारियों से बचाने के लिये बीजोपचार आवश्यक है। श्वेत किट्ट एवं मृदुरोमिल आसिता से बचाव हेतु मेटालेक्जिल (एप्रन एस डी-35) 6 ग्राम एवं तना सड़न या तना गलन रोग से बचाव हेतु कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीज उपचार करें। बुवाई का उचित समय: बारानी क्षेत्रों में सरसों की बुवाई 15 सितम्बर से 15 अक्टुम्बर तक एवं सिंचित क्षेत्रों में 10 से 25 अक्टुम्बर तक कर लेनी चाहिए। यदि फसल को देरी से बोया जाता हैं तो पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं साथ ही चैंपा एवं सफेद रतुआ आदि के अधिक प्रकोप की संभावनाए रहती हैं। बुआई की विधि: बुवाई देशी हल या सरिता या सीड़ ड्रिल से कतारों में करें, पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 से.मी., पौधें से पौधे की दूरी10-12  सेमी  एवं बीज को 2-3  से.मी. से अधिक गहरा न बोयें, अधिक गहरा बोने पर बीज के अंकुरण पर विपरीत प्रभाव पडता है। उर्वरकों की मात्रा एवं विधि: सरसों की भरपूर पैदावार के लिए खाद एवं उर्वरकों का उपयोग मृदा परीक्षण के बाद ही किया जाना चाहिए। सामान्तया 50 किलोग्राम डीएपी, 25 किलोग्राम मयूरेट ऑफ पोटाश, 20 किलोग्राम बेंटोनाइट सल्फर प्रति एकर  की दर से बुआई के समय उपयोग किया जाना चाहिए I इसके बाद 40 किलोग्राम यूरिया प्रति एकर  प्रथम सिंचाई के वक्त, लगभग बुवाई के एक माह बाद दिया जाना चाहिए I खरपतवार नियंत्रण: सरसों में प्रारंभिक अवस्था में अगर खरपतवार नष्ट नही किये जाए तो फसल पर प्रतिकूल प्रवाभ पड़ता है। अगर खरपतवार उग आये हैं तो हाथों, कृषि यंत्रों व खरपतवारनाशी रसायनों से नियंत्रण कर सकते हैं। सरसों की फसल में अनेक प्रकार के खरतपतवार नुकसान पहुंचाते हैंl इनके नियंत्रण के लिए बुवाई के 25 से 30 दिन पश्चात खरपी से निदाई करनी चाहियेl इसके पश्चात दूसरी निदाई 50 दिन बाद कर देनी चाहिए। रासायनिक खरपतवारनाशी में पेण्डामेथीलिन 30 ई.सी. 1.3 लीटर दवा को 200 लीटर पानी में घोलकर बुवाई के 2 दिन के अंदर छिड़काव करे। खड़ी फसल में यदि सकरी पत्ती वाले नींदा अधिक हो तो क्विज़लफोप-पी-इथाइल 5% ई.सी. 400 मिली प्रति एकर 200 लीटर पानी मे घोलकर बुआई के 15 से 20 दिन बाद छिडकाव करें। सिंचाई: सरसों में पहली सिंचाई बुआई के 35-40 दिन पर करें। इसके बाद अगर मौसम शुष्क रहे अर्थात पानी नही बरसे तो बोनी के 70 से 75 दिन की अवस्था पर करें तीसरी सिंचाई बुआई के 100 से 105  दिन बाद करें जिस समय फली का विकास या फली में दाना भर रहा हो सिंचाई अवश्य करें। फसल चक्र: फसल  चक्र का अधिक पैदावार प्राप्त करने, भूमि की उर्वराशक्ति बनाये रखने तथा भूमि में कीड़े ,बीमारियों एवं खरपतवार काम करने में महत्पूर्ण योगदान होता हैल सरसों की खेती के लिए पश्चिमी क्षेत्र में,मूंग-सरसों,ग्वार-सरसों,बाजरा-सरसों एक वर्षीय फसल चक्र तथा बाजरा-सरसों-मूंग /ग्वार -सरसों दो वर्षीय फसल चक्र उपयोग में लिये जा सकते हैंl बारानी क्षेत्रों में जहाँ केवल रबी में फसल ली जाती हो वहसरसों के बाद चना उगाया जा सकता हैl कटाई एवं गहाई: फसल अधिक पकने पर फलियों के चटकने की आशंका बढ़ जाती हे अत: पौधों के पीले पड़ने एवं फलियां भूरि होने पर फसल की कटाई कर लेनी चाहिएl लाटे को सुखाकर थ्रेसर दाने को अलग कर लिया जाता हे l उपज: सरसों की उन्नत विधियों द्वारा खेती करने पर औसतन 6 से 8 क्विंटल प्रति एकर  दाने की उपज प्राप्त हो जाती है।
23-Mar-2018 21:41
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SUNNY KUMAR Farmer 588b3e4d62d7c,588b33899d781
marigold flowers ki kheti kb suru kare aur kaise
23-Mar-2018 18:24
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Kinder Farmer 588b3e4d7553f,588b33899e44a
सर माने टमाटर की फसल लगाई हूईहे और इसके बारे बताए
23-Mar-2018 16:54
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Hemant Farmer 588b3e4dac648,588b33899fac7
sir sarso ke jankari deve
23-Mar-2018 09:10
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Dr. Abdul Professional 588b3e4d9848e,588b33899efb3
जी....कद्दू की खेती के बारे में निचे दी गयी जानकारी को ध्यान से पढ़ें........जलवायु इसके लिए गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है। कददू की खेती के लिए शितोष्ण एवं समशितोष्ण जलवायु उपयुक्त होती है इसके लिए 20 से 30 डिग्री सेंटीग्रेट तापक्रम होना चाहिए। भूमि इसके लिए दोमट एवं बलुई दोमट भूमि सर्वोत्तम होती है। यह 5.5 से 6.8 पीएच तक की भूमि में उगाया जा सकता है। प्रजातियां इसमें पूसा विश्वास, पूसा विकास, कल्यानपुर पम्पकिन-1, नरेन्द्र अमृत, अर्का सुर्यामुखी, अर्का चन्दन, अम्बली, सी एस 14, सी ओ1 एवम 2, पूसा हाईब्रिड एक और कासी हरित प्रजातियां हैं। खाद और उर्वरक आर्गनिक खाद: कद्दू की फसल और अधिक पैदावार लेने के लिए उसमें कम्पोस्ट खाद का होना बहुत जरूरी है। इसके लिए एक एकड़ भूमि में लगभग 40-50 कुंतल गोबर की अच्छे तरीके से सड़ी हुई खाद और 20 किलो ग्राम नीम की खली वजन और 30 किलो अरंडी की खली इन सब खादों को अच्छी तरह मिलाकर अच्छी तरह मिश्रण तैयार कर खेत में बोवाई के पहले इस खाद को समान मात्रा में बिखेर दें और फिर अच्छे तरीके से खेत की जुताई कर खेत को तैयार करें इसके बाद बोवाई करें। फिर जब फसल 20-25 दिन की हो जाए तब उसमे नीम का काढ़ा और गौमूत्र लीटर मिलाकर अच्छी तरह मिश्रण तैयार कर फसल में तर-बतर कर छिड़काव करें और हर 10-15 दिन के अंतर पर छिड़काव करें। रासायनिक खाद 250 से 300 कुन्तल सड़ी गोबर की खाद आखरी जुताई के समय खेत में अच्छी तरह से मिला देना चाहिए। इसके साथ ही 80 किलोग्राम नत्रजन, 80 किलोग्राम फास्फोरस एवं 40 किलोग्राम पोटाश तत्व के रूप में देना चाहिए। नत्रजन की आधी मात्रा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा खेत की तैयारी के समय तथा नत्रजन की आधी मात्रा दो भागों में टाप ड्रेसिंग में देना चाहिए। पहली बार तीन से चार पत्तियां पौधे पर आने पर तथा दूसरी बार फूल आने पर नत्रजन देना चाहिए। खरपतवार नियंत्रण जायद में कद्दू की खेती के लिए प्रत्येक सप्ताह सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है, लेकिन खरीफ अर्थात बरसात में इसके लिए सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है। पानी न बरसने पर एवं ग्रीष्मकालीन फसल के लिए 8-10 दिन के अंतर पर सिंचाई करें। फसल को खरपतवारों से मुक्त रखना चाहिए फसल में 3-4 बार हलकी निराई-गुड़ाई करें। गहरी निराई करने से पौधों की जड़ें कटने का भय रहता है। विदेशी किस्में भारत में पैटीपान, ग्रीन हब्बर्ड, गोल्डन हब्बर्ड, गोल्डन कस्टर्ड, और यलो स्टेट नेक नामक किस्में छोटे स्तर पर उगाई जाती हैं। बोने का समय बोने का समय इस बात पर निर्भर करता है की इसे कहां पर उगाया जा रहा है। मैदानी क्षेत्रों में इसे साल में दो बार बोया जाता है फ़रवरी-मार्च, जून-जुलाई। पर्वतीय क्षेत्रों में इसकी बोवाई मार्च-अप्रैल में की जाती है नदियों के किनारे इसकी बोवाई दिसंबर में की जाती है। बीज की मात्रा 2.5 से 3 किलो ग्राम बीज प्रति एकड़ पर्याप्त होता है।……. सिचाई एवं खरपतवार नियंत्रण………… जायद में कददू की खेती के लिए प्रत्येक सप्ताह सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है लेकिन खरीफ अर्थात बरसात में इसके लिए सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है पानी न बरसने पर एवं ग्रीष्म कालीन फसल के लिए 8-10 दिन के अंतर पर सिचाई करें | फसल को खरपतवारों से मुक्त रखना चाहिए फसल में 3-4 बार हलकी निराई- गुड़ाई करें गहरी निराई करने से पौधों की जड़ें कटने का भय रहता है |… कीट एवं रोग नियंत्रण ……… लालड़ी पौधों पर दो पत्तियां निकलने पर इस कीट का प्रकोप शुरू हो जाता है यह कीट पत्तियों और फूलों को खाता है इस कीट की सुंडी भूमि के अन्दर पौधों की जड़ों को काटती है |.. रोकथाम इम से कम 40-50 दिन पुराना 15 लीटर गोमूत्र को तांबे के बर्तन में रखकर 5 किलोग्राम धतूरे की पत्तियों एवं तने के साथ उबालें 7.5 लीटर गोमूत्र शेष रहने पर इसे आग से उतार कर ठंडा करें एवं छान लें मिश्रण तैयार कर 3 ली. को प्रति पम्प के द्वारा फसल में तर-बतर कर छिडकाव करना चाहिए |…… फल की मक्खी .. यह मक्खी फलों में प्रवेश कर जाती है और वहीँ पर अंडे देती है अण्डों से सुंडी बाहर निकलती है वह फल को वेकार कर देती है यह मक्खी विशेष रूप से खरीफ वाली फसल को अधिक हानी पहुंचाती है |……. रोकथाम .. इम से कम 40-50 दिन पुराना 15 लीटर गोमूत्र को तांबे के बर्तन में रखकर 5 किलोग्राम धतूरे की पत्तियों एवं तने के साथ उबालें 7.5 लीटर गोमूत्र शेष रहने पर इसे आग से उतार कर ठंडा करें एवं छान लें मिश्रण तैयार कर 3 ली. को प्रति पम्प के द्वारा फसल में तर-बतर कर छिडकाव करना चाहिए |.. सफ़ेद ग्रब …. यह कीट कद्दू वर्गीय पौधों को काफी क्षति पहुंचाती है यह भूमि के अन्दर रहती है और पौधों की जड़ों को खा जाती है जिसके कारण पौधे सुख जाते है |. रोकथाम…. इसकी रोकथाम के लिए खेत में नीम का खाद प्रयोग करें |.. चूर्णी फफूदी ……. यह रोग ऐरीसाइफी सिकोरेसिएरम नमक फफूंदी के कारण होता है पत्तियों एवं तनों पर सफ़ेद दरदरा और गोलाकार जल सा दिखाई देता है जो बाद में आकार में बढ़ जाता है और कत्थई रंग का हो जाता है पूरी पत्तियां पिली पड़कर सुख जाती है पौधों की बढ़वार रुक जाती है | रोकथाम … इसकी रोकथाम के लिए देसी गाय का मूत्र 5 लीटर लेकर 15 ग्राम के आकार के बराबर हींग लेकर पिस कर अच्छी तरह मिलाकर घोल बनाना चाहिए प्रति 2 ली. पम्प के द्वारा तर-बतर कर छिडकाव करे । मृदु रोमिल फफूंदी . यह स्यूडोपरोनोस्पोरा क्यूबेन्सिस नामक फफूंदी के कारण होता है रोगी पत्तियों की निचली सतह पर कोणाकार धब्बे बन जाते है जो ऊपर से पीले या लाल भूरे रंग के होते है | रोकथाम . इम से कम 40-50 दिन पुराना 15 लीटर गोमूत्र को तांबे के बर्तन में रखकर 5 किलोग्राम धतूरे की पत्तियों एवं तने के साथ उबालें 7.5 लीटर गोमूत्र शेष रहने पर इसे आग से उतार कर ठंडा करें एवं छान लें मिश्रण तैयार कर 3 ली. को प्रति पम्प के द्वारा फसल में तर-बतर कर छिडकाव करना चाहिए | मोजैक …. यह विषाणु के द्वारा होता है पत्तियों की बढ़वार रुक जाती है और वे मुड़ जाती है फल छोटे बनते है और उपज कम मिलती है यह रोग चैंपा द्वारा फैलता है |……… रोकथाम ….. इसकी रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा या गोमूत्र तम्बाकू मिलाकर पम्प के द्वारा तर-बतर कर छिडकाव करे । एन्थ्रेक्नोज यह रोग कोलेटोट्राईकम स्पीसीज के कारण होता है इस रोग के कारण पत्तियों और फलो पर लाल काले धब्बे बन जाते है ये धब्बे बाद में आपस में मिल जाते है यह रोग बीज द्वारा फैलता है | रोकथाम …. बीज क़ बोने से पूर्व गौमूत्र या कैरोसिन या नीम का तेल के साथ उपचारित करना चाहिए |……….. तुड़ाई…. कद्दू के फलो की तुड़ाई बाजार मांग पर निर्भर करती है आम तौर पर बोने के 75-90 दिन बाद हरे फल तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते है फल को किसी तेज चाकू से अलग करना चाहिए .|………. उपज ……. सामान्य रूप से 250 से 300 कुंतल प्रति हेक्टर उपज प्राप्त होती हैI…… धन्यवाद
20-Mar-2018 12:05
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Dr. Abdul Professional 588b3e4d9848e,588b33899efb3
पंकज जी....कद्दू की खेती के बारे में निचे दी गयी जानकारी को ध्यान से पढ़ें........जलवायु इसके लिए गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है। कददू की खेती के लिए शितोष्ण एवं समशितोष्ण जलवायु उपयुक्त होती है इसके लिए 20 से 30 डिग्री सेंटीग्रेट तापक्रम होना चाहिए। भूमि इसके लिए दोमट एवं बलुई दोमट भूमि सर्वोत्तम होती है। यह 5.5 से 6.8 पीएच तक की भूमि में उगाया जा सकता है। प्रजातियां इसमें पूसा विश्वास, पूसा विकास, कल्यानपुर पम्पकिन-1, नरेन्द्र अमृत, अर्का सुर्यामुखी, अर्का चन्दन, अम्बली, सी एस 14, सी ओ1 एवम 2, पूसा हाईब्रिड एक और कासी हरित प्रजातियां हैं। खाद और उर्वरक आर्गनिक खाद: कद्दू की फसल और अधिक पैदावार लेने के लिए उसमें कम्पोस्ट खाद का होना बहुत जरूरी है। इसके लिए एक एकड़ भूमि में लगभग 40-50 कुंतल गोबर की अच्छे तरीके से सड़ी हुई खाद और 20 किलो ग्राम नीम की खली वजन और 30 किलो अरंडी की खली इन सब खादों को अच्छी तरह मिलाकर अच्छी तरह मिश्रण तैयार कर खेत में बोवाई के पहले इस खाद को समान मात्रा में बिखेर दें और फिर अच्छे तरीके से खेत की जुताई कर खेत को तैयार करें इसके बाद बोवाई करें। फिर जब फसल 20-25 दिन की हो जाए तब उसमे नीम का काढ़ा और गौमूत्र लीटर मिलाकर अच्छी तरह मिश्रण तैयार कर फसल में तर-बतर कर छिड़काव करें और हर 10-15 दिन के अंतर पर छिड़काव करें। रासायनिक खाद 250 से 300 कुन्तल सड़ी गोबर की खाद आखरी जुताई के समय खेत में अच्छी तरह से मिला देना चाहिए। इसके साथ ही 80 किलोग्राम नत्रजन, 80 किलोग्राम फास्फोरस एवं 40 किलोग्राम पोटाश तत्व के रूप में देना चाहिए। नत्रजन की आधी मात्रा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा खेत की तैयारी के समय तथा नत्रजन की आधी मात्रा दो भागों में टाप ड्रेसिंग में देना चाहिए। पहली बार तीन से चार पत्तियां पौधे पर आने पर तथा दूसरी बार फूल आने पर नत्रजन देना चाहिए। खरपतवार नियंत्रण जायद में कद्दू की खेती के लिए प्रत्येक सप्ताह सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है, लेकिन खरीफ अर्थात बरसात में इसके लिए सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है। पानी न बरसने पर एवं ग्रीष्मकालीन फसल के लिए 8-10 दिन के अंतर पर सिंचाई करें। फसल को खरपतवारों से मुक्त रखना चाहिए फसल में 3-4 बार हलकी निराई-गुड़ाई करें। गहरी निराई करने से पौधों की जड़ें कटने का भय रहता है। विदेशी किस्में भारत में पैटीपान, ग्रीन हब्बर्ड, गोल्डन हब्बर्ड, गोल्डन कस्टर्ड, और यलो स्टेट नेक नामक किस्में छोटे स्तर पर उगाई जाती हैं। बोने का समय बोने का समय इस बात पर निर्भर करता है की इसे कहां पर उगाया जा रहा है। मैदानी क्षेत्रों में इसे साल में दो बार बोया जाता है फ़रवरी-मार्च, जून-जुलाई। पर्वतीय क्षेत्रों में इसकी बोवाई मार्च-अप्रैल में की जाती है नदियों के किनारे इसकी बोवाई दिसंबर में की जाती है। बीज की मात्रा 2.5 से 3 किलो ग्राम बीज प्रति एकड़ पर्याप्त होता है।……. सिचाई एवं खरपतवार नियंत्रण………… जायद में कददू की खेती के लिए प्रत्येक सप्ताह सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है लेकिन खरीफ अर्थात बरसात में इसके लिए सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है पानी न बरसने पर एवं ग्रीष्म कालीन फसल के लिए 8-10 दिन के अंतर पर सिचाई करें | फसल को खरपतवारों से मुक्त रखना चाहिए फसल में 3-4 बार हलकी निराई- गुड़ाई करें गहरी निराई करने से पौधों की जड़ें कटने का भय रहता है |… कीट एवं रोग नियंत्रण ……… लालड़ी पौधों पर दो पत्तियां निकलने पर इस कीट का प्रकोप शुरू हो जाता है यह कीट पत्तियों और फूलों को खाता है इस कीट की सुंडी भूमि के अन्दर पौधों की जड़ों को काटती है |.. रोकथाम इम से कम 40-50 दिन पुराना 15 लीटर गोमूत्र को तांबे के बर्तन में रखकर 5 किलोग्राम धतूरे की पत्तियों एवं तने के साथ उबालें 7.5 लीटर गोमूत्र शेष रहने पर इसे आग से उतार कर ठंडा करें एवं छान लें मिश्रण तैयार कर 3 ली. को प्रति पम्प के द्वारा फसल में तर-बतर कर छिडकाव करना चाहिए |…… फल की मक्खी .. यह मक्खी फलों में प्रवेश कर जाती है और वहीँ पर अंडे देती है अण्डों से सुंडी बाहर निकलती है वह फल को वेकार कर देती है यह मक्खी विशेष रूप से खरीफ वाली फसल को अधिक हानी पहुंचाती है |……. रोकथाम .. इम से कम 40-50 दिन पुराना 15 लीटर गोमूत्र को तांबे के बर्तन में रखकर 5 किलोग्राम धतूरे की पत्तियों एवं तने के साथ उबालें 7.5 लीटर गोमूत्र शेष रहने पर इसे आग से उतार कर ठंडा करें एवं छान लें मिश्रण तैयार कर 3 ली. को प्रति पम्प के द्वारा फसल में तर-बतर कर छिडकाव करना चाहिए |.. सफ़ेद ग्रब …. यह कीट कद्दू वर्गीय पौधों को काफी क्षति पहुंचाती है यह भूमि के अन्दर रहती है और पौधों की जड़ों को खा जाती है जिसके कारण पौधे सुख जाते है |. रोकथाम…. इसकी रोकथाम के लिए खेत में नीम का खाद प्रयोग करें |.. चूर्णी फफूदी ……. यह रोग ऐरीसाइफी सिकोरेसिएरम नमक फफूंदी के कारण होता है पत्तियों एवं तनों पर सफ़ेद दरदरा और गोलाकार जल सा दिखाई देता है जो बाद में आकार में बढ़ जाता है और कत्थई रंग का हो जाता है पूरी पत्तियां पिली पड़कर सुख जाती है पौधों की बढ़वार रुक जाती है | रोकथाम … इसकी रोकथाम के लिए देसी गाय का मूत्र 5 लीटर लेकर 15 ग्राम के आकार के बराबर हींग लेकर पिस कर अच्छी तरह मिलाकर घोल बनाना चाहिए प्रति 2 ली. पम्प के द्वारा तर-बतर कर छिडकाव करे । मृदु रोमिल फफूंदी . यह स्यूडोपरोनोस्पोरा क्यूबेन्सिस नामक फफूंदी के कारण होता है रोगी पत्तियों की निचली सतह पर कोणाकार धब्बे बन जाते है जो ऊपर से पीले या लाल भूरे रंग के होते है | रोकथाम . इम से कम 40-50 दिन पुराना 15 लीटर गोमूत्र को तांबे के बर्तन में रखकर 5 किलोग्राम धतूरे की पत्तियों एवं तने के साथ उबालें 7.5 लीटर गोमूत्र शेष रहने पर इसे आग से उतार कर ठंडा करें एवं छान लें मिश्रण तैयार कर 3 ली. को प्रति पम्प के द्वारा फसल में तर-बतर कर छिडकाव करना चाहिए | मोजैक …. यह विषाणु के द्वारा होता है पत्तियों की बढ़वार रुक जाती है और वे मुड़ जाती है फल छोटे बनते है और उपज कम मिलती है यह रोग चैंपा द्वारा फैलता है |……… रोकथाम ….. इसकी रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा या गोमूत्र तम्बाकू मिलाकर पम्प के द्वारा तर-बतर कर छिडकाव करे । एन्थ्रेक्नोज यह रोग कोलेटोट्राईकम स्पीसीज के कारण होता है इस रोग के कारण पत्तियों और फलो पर लाल काले धब्बे बन जाते है ये धब्बे बाद में आपस में मिल जाते है यह रोग बीज द्वारा फैलता है | रोकथाम …. बीज क़ बोने से पूर्व गौमूत्र या कैरोसिन या नीम का तेल के साथ उपचारित करना चाहिए |……….. तुड़ाई…. कद्दू के फलो की तुड़ाई बाजार मांग पर निर्भर करती है आम तौर पर बोने के 75-90 दिन बाद हरे फल तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते है फल को किसी तेज चाकू से अलग करना चाहिए .|………. उपज ……. सामान्य रूप से 250 से 300 कुंतल प्रति हेक्टर उपज प्राप्त होती हैI…… धन्यवाद
20-Mar-2018 12:04
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Rizu Farmer 588b3e4d91872,588b33899ee56

फसल अवशेष,अधिक पकी सब्जी,मुरझाये हुए फल-सब्जी, पेड़ (बैगन,मिर्च,टमाटर,आदि),खेत का सूखा कचरा ,आदि को किस तरह खाद में तब्दील किया जाये?? सुझाव दे।

10-May-2017 17:39
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